बंजारा समाज का ST आरक्षण आंदोलन: इतिहास, लोकुर समिति, राज्य पुनर्गठन और संवैधानिक आधार

बंजारा समाज की अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण की मांग ऐतिहासिक दस्तावेजों, ब्रिटिश कालीन अभिलेखों, विभिन्न आयोगों की सिफारिशों तथा 1956 के राज्य पुनर्गठन से जुड़े तथ्यों पर आधारित बताई जाती है। इस लेख में लोकुर समिति के मानदंड, सरकारी रिपोर्टों, संवैधानिक प्रावधानों तथा विभिन्न राज्यों में बंजारा समाज की वर्तमान आरक्षण स्थिति का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यह विषय सामाजिक न्याय, संवैधानिक प्रक्रिया और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

Jul 11, 2026 - 11:36
अद्यतन: 5 hours ago
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बंजारा समाज का ST आरक्षण आंदोलन: इतिहास, लोकुर समिति, राज्य पुनर्गठन और संवैधानिक आधार

7% जनजातीय आरक्षण के स्थान पर अलग आरक्षण की मांग

बंजारा समाज द्वारा अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त करने के लिए किए गए ऐतिहासिक संघर्ष, महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज़ों, ब्रिटिश कालीन अभिलेखों, विभिन्न आयोगों की सिफारिशों तथा समाज द्वारा किए गए आंदोलनों, धरनों और आमरण अनशनों का विस्तृत विवरण।

संदर्भ ग्रंथ:
आरक्षण का इतिहास – यादीकार पंजाबराव चव्हाण


आज महाराष्ट्र में बंजारा समाज बड़ी संख्या में हैदराबाद गजट के अनुसार अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण लागू करने की मांग कर रहा है। इस मांग के समर्थन में राज्य के विभिन्न स्थानों पर लाखों लोगों की विशाल रैलियाँ आयोजित की जा रही हैं।

इस कारण कुछ आदिवासी नेताओं, आदिवासी समाज के लोगों तथा मीडिया के कुछ वर्गों द्वारा यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या बंजारा समाज की अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग संवैधानिक है?

ऐसा प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मैं महाराष्ट्र के सभी आदिवासी भाई-बहनों तथा मीडिया से कहना चाहता हूँ कि बंजारा समाज की ST आरक्षण की मांग पूर्णतः संवैधानिक है। यह मांग वर्तमान में अनुसूचित जनजातियों को प्राप्त 7% आरक्षण में हिस्सेदारी मांगने की नहीं है, बल्कि 1956 से पहले जो आरक्षण बंजारा समाज को प्राप्त था, उसी अधिकार को पुनः बहाल करने तथा बंजारा समाज के लिए अलग "बी" श्रेणी (B Category) बनाकर पृथक आरक्षण प्रदान करने की मांग है।

इस बात को सभी को समझना चाहिए।

यदि ब्रिटिश शासनकाल के ऐतिहासिक अभिलेखों, महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज़ों, स्वतंत्रता के बाद गठित विभिन्न आयोगों की सिफारिशों, राज्य पुनर्गठन के समय गठित लोकुर समिति (Lokur Committee) की अनुशंसाओं तथा अन्य सरकारी रिकॉर्ड का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि बंजारा समाज मूल रूप से 100 प्रतिशत आदिवासी समुदाय है।

दुर्भाग्य से इन ऐतिहासिक तथ्यों को स्वीकार करने की इच्छा बहुत कम दिखाई देती है। मीडिया में जो बहसें हो रही हैं, उनमें गहन अध्ययन का अभाव दिखाई देता है। यदि वास्तविक शोधकर्ताओं को अपने तथ्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए, तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि बंजारा समाज वास्तव में एक आदिवासी समुदाय है।

इसी उद्देश्य से यह लेख महाराष्ट्र सरकार से आग्रह करता है कि नीचे दिए गए सभी ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का अध्ययन कर बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण प्रदान किया जाए।

1935 की जाति एवं जनजाति सूची

ब्रिटिश शासनकाल में भारत शासन अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935) के अंतर्गत वर्ष 1936 में भारत की जातियों एवं जनजातियों की सूची प्रकाशित की गई थी।

इस सूची के अनुसार भारत में केवल निम्नलिखित तीन वर्गों को सामाजिक रूप से पिछड़ा माना गया था—

  1. अनुसूचित जातियाँ (Scheduled Castes)
  2. अनुसूचित जनजातियाँ (Scheduled Tribes)
  3. अपराधी जनजातियाँ (Criminal Tribes)

बाद में भारतीय संविधान द्वारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण का अधिकार प्रदान किया गया, जबकि Criminal Tribes को आरक्षण नहीं मिला क्योंकि उन्हें अपराधी समुदाय के रूप में वर्गीकृत किया गया था।

ऐतिहासिक अभिलेख (Historical Records)

1305 – फ़सली अभिलेखों एवं अन्य दस्तावेज़ों में जनजातियों का उल्लेख मिलता है।

1314 – फ़सली अभिलेखों एवं अन्य दस्तावेज़ों में जनजातियों का उल्लेख मिलता है।

1590आइने-अकबरी (Ain-i-Akbari) में गोर बंजारा समुदाय को एक आदिम जनजाति (Primitive Tribe) के रूप में वर्णित किया गया है।

1793 – ब्रिटिश सर्वेक्षणों में बंजारा समुदाय को जनजाति के रूप में दर्ज किया गया। मानवशास्त्रियों डब्ल्यू. क्रूक (1886), एडगर थर्स्टन (1909), रसेल एवं हीरालाल, इब्बेटसन तथा एन्थोवेन (1922) के अध्ययन के अनुसार तथाकथित अपराधी एवं घुमंतू जनजातियाँ मूल रूप से आदिवासी समुदाय थीं।

1985–1992 – शिमला स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ की रिपोर्ट में बंजारा समुदाय को जनजातीय समुदाय के रूप में दर्ज किया गया।

1960 – महाराष्ट्र की स्कूल पाठ्यपुस्तकों में गोरमाटी (Gormati), कोलामी तथा कोकरू भाषाओं को महाराष्ट्र की जनजातीय समुदायों की पारंपरिक बोलियों के रूप में वर्णित किया गया।

ब्रिटिश शासनकाल के अभिलेख

1860 – भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) में बंजारा समुदाय को जनजाति (Tribe) के रूप में दर्ज किया गया।

1871 – बंजारा समुदाय को Criminal Tribe (अपराधी जनजाति) घोषित किया गया।

1872 – आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code - CRPC) में इन्हें जनजाति के रूप में दर्ज किया गया।

1916भारतीय विधायी समिति (Sir Henry Committee) ने बंजारा समुदाय को Depressed Class (दलित/वंचित वर्ग) के रूप में दर्ज किया।

1917Southborough Franchise Committee ने भी बंजारा समुदाय को Depressed Class के रूप में मान्यता दी।

1921 – मद्रास प्रेसीडेंसी आरक्षण अधिनियम के अंतर्गत गैर-ब्राह्मण समुदायों को 44% आरक्षण प्रदान किया गया।

1925मुड्डीमन आयोग (Muddiman Commission) ने बंजारा समुदाय को Backward Class / Depressed Class के रूप में दर्ज किया।

1928 – बंबई सरकार ने पिछड़े वर्गों के अध्ययन के लिए O.H.B. Start Committee का गठन किया, जिसने पिछड़े वर्गों को तीन श्रेणियों में विभाजित करने की अनुशंसा की।

1928Hartang Committee ने निम्नलिखित तीन वर्गों की अनुशंसा की—

  • Depressed Classes
  • Tribal Forest Communities
  • Criminal Tribes

1929 – भारतीय केंद्रीय समिति ने बंजारा समुदाय को Tribal / Criminal Tribes श्रेणी में दर्ज किया।

1931 – भारत की जनगणना में बंजारा समुदाय को Scheduled Tribe (अनुसूचित जनजाति) के रूप में दर्ज किया गया।

1932 – भारतीय मताधिकार समिति (Indian Franchise Committee) ने गैर-द्विज जातियों का अध्ययन किया।

1935 – पिछड़े वर्गों को तीन भागों में विभाजित किया गया—

  • अनुसूचित जाति
  • अनुसूचित जनजाति
  • अपराधी जनजाति

1936 – Depressed Tribes (वंचित जनजातियों) की आधिकारिक सूची प्रकाशित की गई।

1939Bombay Criminal Enquiry Committee ने बंजारा समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज किया।

1947 – Criminal Inquiry Committee द्वारा पुनः अध्ययन किया गया।

1948हैदराबाद गजट में बंजारा समुदाय को क्रमांक 4 पर अनुसूचित जनजाति के रूप में शामिल किया गया। इसी प्रकार CP & Berar Gazette में भी बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज किया गया।

1940–1949 – Criminal Tribes Inquiry Committee ने अपनी रिपोर्ट में बंजारा समुदाय को विशेष अवसर एवं संरक्षण प्रदान करने की सिफारिश की।

स्वतंत्र भारत में आरक्षण से संबंधित आयोगों एवं समितियों की प्रमुख सिफारिशें

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बंजारा समाज की सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए अनेक आयोगों और समितियों का गठन किया गया। इन समितियों ने समय-समय पर अपनी रिपोर्टों में बंजारा समाज की वास्तविक स्थिति का उल्लेख किया तथा कई मामलों में अनुसूचित जनजाति (ST) से संबंधित सिफारिशें भी प्रस्तुत कीं।

1949

Criminal Tribes Enquiry Committee ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

1950

भारतीय संविधान लागू हुआ।

संविधान के अनुच्छेद 15 के अंतर्गत सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान किया गया। वहीं अनुच्छेद 15(4) के अनुसार यदि कोई समुदाय सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है, तो राज्य सरकार उसे अनुसूचित जाति (SC) अथवा अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने की अनुशंसा कर सकती है।

1950

दिल्ली से Criminal Tribes Inquiry Report प्रकाशित हुई।

1950

अंतरोणीकर आयोग (Antaronikar Commission) ने अपनी रिपोर्ट में बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज किया।

10 जनवरी 1950

सेंट्रल प्रोविंसेज़ एंड बरार (Central Provinces & Berar) गजट में बंजारा समाज का नाम क्रमांक 4 पर अनुसूचित जनजाति के रूप में प्रकाशित किया गया।

1951

भारतीय संविधान के प्रथम संशोधन द्वारा सरकार को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के विकास हेतु विशेष प्रावधान करने का अधिकार दिया गया।

1952

बंजारा समाज को विमुक्त जाति (Denotified Tribe) के रूप में दर्ज किया गया।

1952

K.M. Kapadia द्वारा Criminal Tribes Social Bulletin India प्रकाशित किया गया।

1953

कालेलकर आयोग (Kalelkar Commission) ने बंजारा समाज को अत्यंत पिछड़ा वर्ग (Extremely Backward Class) माना।

1956

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति संशोधन आदेश (SC/ST Modification Order) लागू किया गया।

1957

उत्तर प्रदेश में Criminal Tribes Inquiry Committee का गठन किया गया।

1959

फाटे समिति (Phate Committee) की स्थापना।

1959

एल्विन समिति (Elwin Committee) का गठन।

1960

ढेबर आयोग (Dhebar Commission) का गठन।

1961

धांडे समिति (Dhande Committee) ने अनुशंसा की कि बंजारा समाज को अनुसूचित जनजातियों के समान सुविधाएँ एवं रियायतें प्रदान की जानी चाहिए।

1965

लोकुर समिति (Lokur Committee) ने बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की अनुशंसा की।

1967

Bibliography on Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Minority Communities प्रकाशित हुई, जिसमें जातीय पहचान से संबंधित महत्वपूर्ण संदर्भ दिए गए।

1969

शिकू आयोग (Shiku Commission) की रिपोर्ट।

1971

Ethnographic Notes (A. Chandrasekhar) प्रकाशित।

1975

N. N. Dubey द्वारा Criminal Tribes Policy and Programme Report on Backward Classes in India प्रकाशित।

1976

SC/ST संशोधन आदेश लागू किया गया।

1976

संसद ने अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों पर लागू क्षेत्रीय प्रतिबंध (Area Restriction) समाप्त कर दिए।

इसी वर्ष जनजातीय कार्य मंत्रालय ने यह अनुशंसा की कि यदि किसी समुदाय के लोगों को राज्य के किसी एक तहसील में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र दिया जा रहा है, तो उसी राज्य में उस समुदाय के सभी लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलना चाहिए।

1979

मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बंजारा समाज की सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन को स्वीकार किया।

1982

मंडल आयोग के सदस्य एल. आर. नाईक ने अपने असहमति नोट (Dissent Note) में बंजारा समाज को अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के लाभ दिए जाने की अनुशंसा की।

31 मार्च 1989

महाराष्ट्र शासन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

तृतीय पंचवर्षीय योजना

इस योजना में भी बंजारा समाज के विकास के संबंध में महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं।

10 अगस्त 1993

डॉ. डी. सी. वाधवा आयोग ने बंजारा समाज को संवैधानिक आरक्षण प्रदान करने की अनुशंसा की।

2002

वेंकटचलैया आयोग (Venkatachaliah Commission) की रिपोर्ट।

2004

रेणके आयोग (Renke Commission) का गठन।

2004

न्यायमूर्ति बापट आयोग (Justice Bapat Commission) ने विमुक्त एवं घुमंतू जातियों को अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल करने की अनुशंसा की।

2006

सच्चर समिति (Sachar Committee) ने मुस्लिम बंजारा समाज की अत्यंत पिछड़ी स्थिति का उल्लेख किया।

2007

डॉ. गणेश देवी तकनीकी सलाहकार समिति (Technical Advisory Committee) की रिपोर्ट।

2009

डॉ. नरेंद्र जाधव अध्ययन समूह समिति की रिपोर्ट।

2010

TAG Commission की रिपोर्ट।

2011

NAC Committee Report प्रकाशित।

2014

भाटिया आयोग (Bhatia Commission) की रिपोर्ट।

2015

भिकू दादा इदाते आयोग ने बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा की।

इसी वर्ष राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) की स्थापना की गई।

भाटिया आयोग ने यह भी अनुशंसा की कि बंजारा समाज की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को देखते हुए उस पर क्रीमी लेयर (Creamy Layer) की शर्त लागू नहीं की जानी चाहिए।

इसी अवधि में राष्ट्रीय विमुक्त एवं घुमंतू जनजाति आयोग तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी समय-समय पर बंजारा समाज के संबंध में महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं।

2017

न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग (Justice Rohini Commission) का गठन।

1 अप्रैल 2018

भारतीय संसद ने निर्णय लिया कि जो समुदाय अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित पाँच मानदंडों को पूरा करते हैं, उनके प्रस्ताव को जनजातीय आयोग की अनुशंसा के बाद केंद्र सरकार के माध्यम से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भेजा जाएगा।

19 जून 2018

जनजातीय कार्य मंत्रालय, नई दिल्ली ने महाराष्ट्र सरकार के प्रधान सचिव, जनजातीय विकास विभाग को पत्र भेजकर बंजारा समाज का नाम अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की अनुशंसा केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश दिया।

28 अगस्त 2018

उपरोक्त पत्र के आधार पर महाराष्ट्र सरकार के प्रधान सचिव, जनजातीय विकास विभाग, मुंबई ने आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (TRTI), पुणे के आयुक्त को आवश्यक अनुशंसाएँ प्रस्तुत करने हेतु पत्र जारी किया।

30 अगस्त 2024

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-classification) को वैधानिक स्वीकृति प्रदान की।

अनुसूचित जनजाति आदेश, 1950 के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में बंजारा समाज की स्थिति

अनुसूचित जनजाति आदेश, 1950 के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में बंजारा समाज को निम्न प्रकार से अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी गई—

  • आंध्र प्रदेश – सुगाली, लम्बाड़ी एवं बंजारा (क्रमांक 28)
  • सेंट्रल प्रोविंसेज़ एंड बरार – क्रमांक 4
  • उड़ीसा (ओडिशा) – क्रमांक 3

1956 : भाषाई राज्य पुनर्गठन के कारण हुआ ऐतिहासिक अन्याय

वर्ष 1960 से पहले मराठवाड़ा क्षेत्र हैदराबाद राज्य का हिस्सा था, जबकि विदर्भ मध्य प्रदेश (सी.पी. एंड बरार) के अंतर्गत आता था। इन क्षेत्रों में रहने वाले विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के लोग एक ही भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते थे।

लेकिन भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन (States Reorganisation) के बाद स्थिति बदल गई।

  • सी.पी. एंड बरार के 8 जिले महाराष्ट्र में शामिल कर दिए गए।
  • हैदराबाद राज्य के 5 जिले भी महाराष्ट्र में मिला दिए गए।
  • इस प्रकार 1960 में कोंकण, मुंबई, विदर्भ और मराठवाड़ा को मिलाकर महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ।

परिणाम

  • हैदराबाद राज्य के 3 जिले आंध्र प्रदेश में चले गए, जहाँ बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण मिला।
  • 8 जिले कर्नाटक में चले गए, जहाँ उन्हें अनुसूचित जाति (SC) का आरक्षण प्राप्त हुआ।
  • लेकिन महाराष्ट्र में शामिल हुए 5 जिले तथा सी.पी. एंड बरार के 8 जिले 1956 के बाद लागू व्यवस्था में आरक्षण से वंचित रह गए।

जबकि—

  • समुदाय एक ही था।
  • भाषा एक ही थी।
  • पारंपरिक वेशभूषा समान थी।
  • रीति-रिवाज समान थे।
  • जीवनशैली समान थी।
  • कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बंजारा समाज के बीच वैवाहिक संबंध भी निरंतर बने रहे।

इसके बावजूद केवल भाषाई राज्य पुनर्गठन के कारण महाराष्ट्र का बंजारा समाज आरक्षण से वंचित रह गया।

लेख के अनुसार यह एक गंभीर प्रशासनिक त्रुटि थी, जिसे सरकार को सुधारना चाहिए।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम (1 नवंबर 1956) के प्रावधान

29 अक्टूबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अंतर्गत Schedule One और Schedule Two तैयार किए गए।

इनमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था—

1.

यदि कोई जाति या जनजाति पुराने राज्य में जिस श्रेणी का लाभ प्राप्त कर रही थी, तो नए राज्य में भी उसे वही लाभ मिलना चाहिए।

उदाहरण के लिए—

यदि हैदराबाद राज्य में बंजारा (लभान) जनजाति अनुसूचित जनजाति थी, तो महाराष्ट्र (तत्कालीन बॉम्बे राज्य) में भी उसे वही दर्जा मिलना चाहिए था।

2.

कुछ जनजातियों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाने की अनुशंसा की गई थी।

लेकिन उस सूची में—

  • बंजारा
  • लभान
  • सुगाली

इनमें से किसी का नाम नहीं था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय भी सरकार बंजारा समाज को आदिवासी समुदाय के रूप में स्वीकार करती थी।

1965 : लोकुर समिति (Lokur Committee) की सिफारिशें

भारत सरकार ने 1965 में लोकुर समिति (Lokur Committee) का गठन किया।

समिति का उद्देश्य था—

  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की सूची का पुनरीक्षण।
  • नई जनजातियों को शामिल करने के मानदंड तय करना।
  • पहले से सूचीबद्ध समुदायों की समीक्षा करना।

समिति ने अनुसूचित जनजाति की पहचान के लिए पाँच प्रमुख मानदंड निर्धारित किए।

लेख के अनुसार महाराष्ट्र की विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियाँ इन सभी मानदंडों को पूरा करती हैं।

1. आदिम विशेषताएँ (Primitive Traits)

विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों में आज भी प्राचीन आदिम संस्कृति की अनेक विशेषताएँ दिखाई देती हैं।

इनकी उपस्थिति के प्रमाण—

  • हड़प्पा सभ्यता
  • मोहनजोदड़ो सभ्यता

तक प्राप्त होते हैं।

आज भी इन समुदायों में—

  • समूहों में रहना
  • शिकार करना
  • प्रकृति पूजा
  • पशु बलि
  • गोदना (Tattoo)
  • महिलाओं द्वारा सींगनुमा आभूषण पहनना
  • जातीय पंचायत (नसब)

जैसी परंपराएँ विद्यमान हैं।

2. विशिष्ट संस्कृति (Distinct Culture)

बंजारा समाज की संस्कृति अन्य समुदायों से पूर्णतः अलग है।

इनकी विशेषताएँ—

  • अपनी अलग बोली
  • सांकेतिक भाषा
  • लोकगीत
  • लोकसंगीत
  • देवी-देवता
  • खान-पान
  • पारंपरिक वेशभूषा
  • सामाजिक रीति-रिवाज
  • जन्म से मृत्यु तक अलग संस्कार

इनकी सांस्कृतिक पहचान आज भी स्पष्ट दिखाई देती है।

3. भौगोलिक अलगाव (Geographical Isolation)

यह समाज परंपरागत रूप से जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों के आसपास निवास करता रहा है।

इनकी बस्तियों को—

  • तांडा
  • पाल

कहा जाता है।

आज भी अनेक तांडे मुख्यधारा से दूर स्थित हैं।

4. सामाजिक संपर्क से दूरी (Shyness of Contact)

लोकुर समिति के अनुसार—

ये समुदाय सामान्य समाज से सीमित संपर्क रखते हैं।

आज भी—

  • अलग जीवन शैली
  • सीमित सामाजिक संपर्क
  • आत्मविश्वास की कमी
  • भाग्य पर अधिक निर्भरता

जैसी प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं।

5. पिछड़ापन एवं गरीबी (Backwardness)

यह समाज—

  • शिक्षा
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • रोजगार

हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है।

आज भी—

  • अनेक परिवार तांडों में रहते हैं।
  • विकास की सुविधाएँ नहीं पहुँच पाई हैं।
  • बड़ी संख्या में लोग हर वर्ष लगभग छह महीने तक गन्ना कटाई मजदूर के रूप में पलायन करते हैं।

इससे उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर बनी हुई है।

दो अतिरिक्त विशेषताएँ

लेख के अनुसार संविधान में बताए गए मानदंडों के अतिरिक्त दो और विशेषताएँ भी इस समाज में स्पष्ट दिखाई देती हैं।

6. घुमंतूपन (Nomadism)

आज भी बंजारा समाज के अनेक परिवार रोजगार की तलाश में—

  • पुणे
  • मुंबई
  • अन्य महानगरों

में पलायन करते हैं।

वे मजदूरी एवं गन्ना कटाई जैसे कार्य करके जीवनयापन करते हैं।

रेणके आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य का उल्लेख किया है।

7. अपराधी होने का सामाजिक कलंक

हालाँकि Criminal Tribes Act समाप्त कर दिया गया है, लेकिन लेख के अनुसार उसका मानसिक प्रभाव आज भी बना हुआ है।

आज भी—

  • चोरी जैसी घटनाओं में सबसे पहले इन्हीं समुदायों पर संदेह किया जाता है।
  • पुलिस द्वारा कई बार अनावश्यक पूछताछ की जाती है।
  • समाज में इनके प्रति पुरानी धारणा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

इसी कारण 1940 एवं 1949 की Criminal Tribes Inquiry Committee ने इन समुदायों को विशेष अवसर देने की अनुशंसा की थी।

संसद में प्रस्तुत विधेयक

बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने हेतु संसद में समय-समय पर विधेयक प्रस्तुत किए गए।

  • 1969 – विधेयक क्रमांक 19
  • 1972
  • 1976

विभिन्न राज्यों में बंजारा समाज की आरक्षण स्थिति

वर्ष राज्य आरक्षण श्रेणी
1950 ओडिशा अनुसूचित जनजाति (ST)
1950 कर्नाटक अनुसूचित जाति (SC)
1950 पंजाब अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
1956 आंध्र प्रदेश अनुसूचित जनजाति (ST), बाद में पूरे राज्य में
1956 बिहार अनुसूचित जाति (SC)
1956 दिल्ली अनुसूचित जाति (SC)
1966 हरियाणा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
1971 हिमाचल प्रदेश अनुसूचित जाति (SC)
2002 झारखंड अनुसूचित जनजाति (ST)
2014 तेलंगाना अनुसूचित जनजाति (ST)
पश्चिम बंगाल OBC
गुजरात OBC
राजस्थान OBC
महाराष्ट्र VJNT
तमिलनाडु DNT
उत्तर प्रदेश OBC
मध्य प्रदेश OBC
केरल कोई आरक्षण नहीं
जम्मू-कश्मीर OBC
अरुणाचल प्रदेश सामान्य वर्ग
दादरा एवं नगर हवेली ST
गोवा OBC
त्रिपुरा OBC
उत्तराखंड OBC
पुडुचेरी OBC

निष्कर्ष

उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार वर्तमान में विभिन्न राज्यों में बंजारा समाज को अलग-अलग आरक्षण श्रेणियों में रखा गया है—

  • 5 राज्यों में अनुसूचित जनजाति (ST)
  • 4 राज्यों में अनुसूचित जाति (SC)
  • 13 राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
  • 2 राज्यों में विमुक्त जनजाति (DNT)
  • 1 राज्य में VJNT
  • 1 राज्य में सामान्य (Open) श्रेणी

लेख के अनुसार एक ही समुदाय को विभिन्न राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों में रखना एक असमान व्यवस्था है। इसलिए इस विसंगति को दूर कर बंजारा समाज के लिए समान और न्यायसंगत आरक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों

बंजारा समाज का कहना है कि 1956 से पहले उन्हें कुछ राज्यों में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त था। राज्य पुनर्गठन के बाद महाराष्ट्र में यह स्थिति बदल गई। समाज की मांग है कि ऐतिहासिक एवं संवैधानिक आधार पर उन्हें पुनः ST का दर्जा दिया जाए।

1965 में गठित लोकुर समिति ने अनुसूचित जनजाति की पहचान के लिए पाँच प्रमुख मानदंड निर्धारित किए और बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की अनुशंसा की थी।

भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद बंजारा समाज विभिन्न राज्यों में अलग-अलग आरक्षण श्रेणियों में विभाजित हो गया। कुछ राज्यों में ST, कुछ में SC, कुछ में OBC और महाराष्ट्र में VJNT श्रेणी लागू हुई।

वर्तमान में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड तथा दादरा एवं नगर हवेली जैसे क्षेत्रों में बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त है।

समर्थकों का तर्क है कि यह मांग ऐतिहासिक सरकारी अभिलेखों, विभिन्न आयोगों की सिफारिशों तथा पूर्व में प्राप्त अनुसूचित जनजाति दर्जे के आधार पर की जा रही है। हालांकि अंतिम निर्णय भारत सरकार और संसद द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार लिया जाता है।

स्वतंत्रता के बाद राज्य पुनर्गठन, स्थानीय सामाजिक वर्गीकरण और समय-समय पर जारी सरकारी अधिसूचनाओं के कारण अलग-अलग राज्यों में बंजारा समाज को ST, SC, OBC, DNT तथा VJNT जैसी विभिन्न श्रेणियों में शामिल किया गया है। यही असमानता आज भी बहस और मांग का प्रमुख विषय है।

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