संत सेवालाल महाराज का जन्म: तिथि, स्थान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
संत श्री सेवालाल महाराज का जन्म 15 फरवरी 1739 को वर्तमान आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के निकट स्थित सेवागढ़ (रामजी नायक के टांडा) में हुआ माना जाता है। उनका जन्म बंजारा समाज के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस लेख में संत सेवालाल महाराज की जन्म तिथि, जन्मस्थान, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, माता-पिता, सेवाभाया नामकरण, जन्म से जुड़ी लोक परंपराएँ तथा बंजारा समाज के लिए उनके जन्म के महत्व का विस्तृत और प्रमाणिक वर्णन किया गया है।
संत श्री सेवालाल महाराज का जन्म केवल एक महान संत के आगमन की घटना नहीं था, बल्कि गोर बंजारा समाज के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत माना जाता है। उन्होंने आगे चलकर बंजारा समाज को सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दिशा प्रदान की। इसलिए उनके जन्म को समझने के लिए उस समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों, बंजारा समाज की जीवनशैली और उनके परिवार की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है।
लोक परंपराओं, बंजारा जनश्रुतियों और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार संत सेवालाल महाराज का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब भारत में राजनीतिक परिवर्तन तेजी से हो रहे थे। मुगल शासन कमजोर पड़ रहा था, विभिन्न रियासतें अपने-अपने क्षेत्रों में शासन कर रही थीं और बंजारा समाज अपने पारंपरिक व्यापार तथा पशुपालन के माध्यम से पूरे देश में भ्रमण कर रहा था।
बंजारा समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
संत सेवालाल महाराज के जन्म से पहले बंजारा समाज भारत का सबसे बड़ा घुमंतू व्यापारिक समुदाय माना जाता था। आधुनिक परिवहन व्यवस्था के अभाव में अनाज, नमक, मसाले, कपड़ा, धातु, हथियार और अन्य आवश्यक वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का कार्य मुख्य रूप से बंजारा व्यापारी करते थे।
उनके विशाल कारवाँ में हजारों बैल, गाय, घोड़े और सैकड़ों परिवार साथ चलते थे। जहाँ पानी, घास और सुरक्षा की सुविधा मिलती, वहीं वे अस्थायी या स्थायी पड़ाव बनाते, जिसे टांडा (थांडा) कहा जाता था।
हर टांडा का अपना प्रशासन होता था। नायक समाज का प्रमुख होता था, जबकि डावो और कारभारी उसके सहयोगी होते थे। सामाजिक विवाद, विवाह, व्यापार और सुरक्षा से जुड़े निर्णय पंचायत के माध्यम से लिए जाते थे। यही संगठित व्यवस्था बंजारा समाज की सबसे बड़ी शक्ति थी।
राजस्थान से दक्षिण भारत तक का प्रवास
बंजारा समाज की लोक परंपराओं के अनुसार उनका मूल संबंध राजस्थान के मेवाड़ और चित्तौड़गढ़ क्षेत्र से माना जाता है। समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियों, युद्धों और व्यापारिक आवश्यकताओं के कारण अनेक बंजारा परिवार मध्य भारत होते हुए दक्षिण भारत की ओर चले गए।
यात्रा करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अनेक क्षेत्रों में अपने टांडे बसाए। इन्हीं प्रवासी समूहों में एक महत्वपूर्ण समूह रामजी नायक के नेतृत्व में दक्षिण भारत पहुँचा। यह समूह आगे चलकर संत सेवालाल महाराज के जन्म से जुड़ा।
रामजी नायक और 360 परिवारों का ऐतिहासिक महत्व
बंजारा परंपरा के अनुसार रामजी नायक एक प्रभावशाली और दूरदर्शी नेता थे। उनके नेतृत्व में लगभग 360 बंजारा परिवार दक्षिण भारत पहुँचे। उनके साथ हजारों गाय-बैल, घोड़े, भेड़ और बकरियाँ भी थीं, जो उस समय बंजारा समाज की आर्थिक शक्ति का आधार थीं।
यात्रा के बाद उन्होंने वर्तमान आंध्र प्रदेश के गूटी (Gooty) क्षेत्र के निकट अपना विशाल टांडा स्थापित किया। यह स्थान आगे चलकर रामजी नायक का टांडा अथवा सेवागढ़ (रामागुंडम) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यही क्षेत्र संत सेवालाल महाराज की जन्मभूमि माना जाता है।
संत सेवालाल महाराज का परिवार
संत सेवालाल महाराज का जन्म बंजारा समाज के प्रतिष्ठित राठौड़ (भुकिया) गोत्र तथा रामावत पाड़ा में हुआ था। उनका परिवार धार्मिक आस्था, सामाजिक प्रतिष्ठा और नेतृत्व के लिए प्रसिद्ध था।
उनके पिता भीमा नायक अपने समय के सम्मानित बंजारा नेता थे। वे न्यायप्रिय, साहसी और माता श्री मारीम्मा (जगदंबा) के अनन्य भक्त थे।
उनकी माता धर्मणीबाई अत्यंत धार्मिक, दयालु और संस्कारी महिला थीं। लोक परंपराओं के अनुसार वे नियमित रूप से देवी की आराधना करती थीं और पूरे परिवार में धार्मिक वातावरण बनाए रखती थीं।
यही आध्यात्मिक वातावरण आगे चलकर संत सेवालाल महाराज के व्यक्तित्व की आधारशिला बना।
भीमा नायक और धर्मणीबाई की संतान की कामना
विवाह के कई वर्षों बाद भी भीमा नायक और धर्मणीबाई को संतान प्राप्त नहीं हुई। इससे परिवार और समाज दोनों चिंतित थे।
कहा जाता है कि भीमा नायक ने माता श्री मारीम्मा की कठोर उपासना आरंभ की। उन्होंने देवी से प्रार्थना की कि उन्हें ऐसी संतान प्राप्त हो जो समाज का मार्गदर्शन करे और धर्म की रक्षा करे।
बंजारा लोक परंपराओं में वर्णन मिलता है कि माता श्री मारीम्मा उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। इसके बाद धर्मणीबाई गर्भवती हुईं।
जब यह शुभ समाचार पूरे टांडा में पहुँचा तो लोगों ने इसे देवी की विशेष कृपा माना। सभी को विश्वास था कि यह संतान भविष्य में समाज के लिए कुछ असाधारण कार्य करेगी।
जन्म से पहले शुभ संकेत
बंजारा लोककथाओं में संत सेवालाल महाराज के जन्म से पहले अनेक शुभ संकेतों का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि टांडा में धार्मिक वातावरण और भी अधिक पवित्र हो गया था। लोग नियमित रूप से देवी मारीम्मा की आराधना करने लगे और पूरे समुदाय में उत्साह का वातावरण था।
यद्यपि इन घटनाओं का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन बंजारा समाज की मौखिक परंपराओं में इन्हें श्रद्धा के साथ सुनाया और स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि संत सेवालाल महाराज के जन्म को केवल पारिवारिक घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक शुभ आरंभ माना जाता है।
जन्म का ऐतिहासिक महत्व
अठारहवीं शताब्दी का भारत अनेक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों से गुजर रहा था। व्यापारिक मार्ग बदल रहे थे, स्थानीय रियासतों के बीच संघर्ष हो रहे थे और बंजारा समाज भी नई चुनौतियों का सामना कर रहा था।
ऐसे समय में संत सेवालाल महाराज का जन्म हुआ। आगे चलकर उन्होंने बंजारा समाज में आत्मविश्वास, संगठन, सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक जागरण का कार्य किया। इसलिए उनके जन्म को बंजारा इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है।
संत सेवालाल महाराज की जन्म तिथि
गोर बंजारा समाज की लोक परंपराओं तथा उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार संत श्री सेवालाल महाराज का जन्म 15 फरवरी 1739 ईस्वी, सोमवार, रोहिणी नक्षत्र में हुआ माना जाता है। यह तिथि आज पूरे देश में बंजारा समाज द्वारा श्रद्धा और उत्साह के साथ संत सेवालाल महाराज जयंती के रूप में मनाई जाती है।
यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में कुछ ग्रंथों और मौखिक परंपराओं में जन्म तिथि को लेकर छोटे-मोटे मतभेद मिलते हैं, फिर भी 15 फरवरी 1739 को सबसे अधिक स्वीकार्यता प्राप्त है। इसी आधार पर अनेक राज्य सरकारें और सामाजिक संगठन भी जयंती का आयोजन करते हैं।
संत सेवालाल महाराज का जन्म स्थान
संत सेवालाल महाराज का जन्म वर्तमान आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित गूटी (Gooty) क्षेत्र के निकट रामजी नायक के टांडा, जिसे सेवागढ़ (रामागुंडम) के नाम से भी जाना जाता है, में हुआ माना जाता है।
उस समय यह क्षेत्र बंजारा व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ बड़ी संख्या में बंजारा परिवार अपने पशुओं के साथ निवास करते थे। आसपास पर्याप्त जल, चरागाह और व्यापारिक मार्ग होने के कारण यह स्थान टांडा बसाने के लिए उपयुक्त माना जाता था।
इसी पवित्र भूमि पर जन्म लेने वाले सेवाभाया ने आगे चलकर पूरे बंजारा समाज को नई दिशा प्रदान की।
जन्म के समय का वातावरण
संत सेवालाल महाराज के जन्म के समय पूरे टांडा में उत्सव जैसा वातावरण था। भीमा नायक और धर्मणीबाई को वर्षों की तपस्या के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी, इसलिए प्रत्येक परिवार ने इस अवसर को देवी मारीम्मा के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया।
बंजारा समाज में किसी भी शुभ अवसर पर सामूहिक पूजा, भजन, प्रसाद वितरण और पारंपरिक उत्सव मनाने की परंपरा रही है। लोक परंपराओं के अनुसार संत सेवालाल महाराज के जन्म पर भी पूरे टांडा में आनंदोत्सव मनाया गया और माता जगदंबा के प्रति विशेष धन्यवाद अर्पित किया गया।
सेवाभाया नाम कैसे पड़ा?
जन्म के बाद बालक का नाम "सेवाभाया" रखा गया।
गोर बोली में "भाया" का अर्थ भाई होता है। समाज की मान्यता थी कि यह बालक केवल अपने परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का भाई और रक्षक बनेगा।
समय के साथ उनके जीवन के विभिन्न चरणों में उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाने लगा—
- सेवाभाया – बचपन और युवावस्था का नाम
- सेवादास – तिरुपति में सेवा कार्यों के कारण
- भंवरलाल – कुछ क्षेत्रों की लोक परंपराओं में प्रचलित नाम
- संत श्री सेवालाल महाराज – समाज द्वारा श्रद्धापूर्वक दिया गया सम्मान
आज भारत और विदेशों में रहने वाला बंजारा समाज उन्हें मुख्य रूप से संत श्री सेवालाल महाराज के नाम से ही जानता और पूजता है।
परिवार में सबसे बड़े पुत्र
संत सेवालाल महाराज अपने माता-पिता की पहली संतान थे। उनके बाद परिवार में तीन और पुत्रों का जन्म हुआ—
- हापा (हंपा)
- बद्दू
- भानु (पूरा)
चारों भाइयों में सेवाभाया सबसे बड़े थे। बचपन से ही वे नेतृत्व क्षमता, अनुशासन और धार्मिक प्रवृत्ति के कारण सभी के प्रिय बन गए थे।
परिवार के साथ-साथ पूरे टांडा के लोग भी उन्हें विशेष स्नेह और सम्मान देते थे।
बचपन से दिखाई देने लगे असाधारण गुण
कहा जाता है कि बाल्यावस्था से ही सेवाभाया अन्य बच्चों से अलग दिखाई देते थे।
वे शांत स्वभाव के, अत्यंत विनम्र और धार्मिक विचारों वाले थे। उन्हें पशुओं से विशेष प्रेम था। वे गायों, बैलों और घोड़ों की सेवा स्वयं करते थे तथा उन्हें परिवार का सदस्य मानते थे।
प्रतिदिन प्रातः स्नान करने के बाद वे माता मारीम्मा की पूजा करते और फिर भगवान चेन्नकेशव के दर्शन के लिए जाते। धार्मिक अनुशासन उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
धीरे-धीरे पूरे टांडा में यह विश्वास बनने लगा कि यह बालक भविष्य में समाज का महान मार्गदर्शक बनेगा।
अठारहवीं शताब्दी का भारत
संत सेवालाल महाराज का जन्म ऐसे समय हुआ जब भारत में मुगल साम्राज्य का प्रभाव कम होने लगा था। विभिन्न क्षेत्रों में मराठा, निज़ाम, मैसूर और अन्य स्थानीय शक्तियाँ उभर रही थीं।
राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव व्यापार पर भी पड़ रहा था। बंजारा समाज, जो सदियों से परिवहन और व्यापार का कार्य करता आया था, उसे नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।
ऐसे समय में समाज को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता थी जो लोगों को संगठित रख सके और उनकी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रख सके। आगे चलकर संत सेवालाल महाराज ने यही भूमिका निभाई।
बंजारा समाज के लिए जन्म का महत्व
संत सेवालाल महाराज का जन्म केवल एक धार्मिक घटना नहीं था।
उन्होंने आगे चलकर—
- समाज में एकता स्थापित की।
- सत्य और ईमानदारी का संदेश दिया।
- पशु संरक्षण को धर्म का हिस्सा बताया।
- आत्मसम्मान और स्वावलंबन पर बल दिया।
- बंजारा संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित किया।
इसी कारण उनके जन्म दिवस को आज केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना दिवस के रूप में भी देखा जाता है।
आज कैसे मनाई जाती है जयंती?
हर वर्ष 15 फरवरी को देशभर में संत सेवालाल महाराज जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है।
इस अवसर पर—
- शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं।
- भजन-कीर्तन आयोजित होते हैं।
- लापसी का प्रसाद वितरित किया जाता है।
- हवन और सामूहिक पूजा होती है।
- समाज सुधार एवं शिक्षा पर संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं।
- युवाओं को संत सेवालाल महाराज के जीवन और विचारों से परिचित कराया जाता है।
यह पर्व आज बंजारा समाज की सांस्कृतिक एकता का महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है।
संत सेवालाल महाराज के जन्म से जुड़े ऐतिहासिक स्रोत
संत श्री सेवालाल महाराज के जीवन का अधिकांश इतिहास बंजारा समाज की लोक परंपराओं, भजनों, वंशावलियों, मौखिक कथाओं और समाज के धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से संरक्षित रहा है। लंबे समय तक बंजारा समाज की परंपराएँ लिखित रूप में कम और मौखिक रूप में अधिक प्रचलित थीं। इसी कारण उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रहीं।
बाद में विभिन्न इतिहासकारों, समाजसेवियों और बंजारा विद्वानों ने इन लोककथाओं, पारिवारिक वंशावली, धार्मिक परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन कर उन्हें पुस्तकों के रूप में संकलित किया। इन्हीं स्रोतों के आधार पर आज संत सेवालाल महाराज के जन्म, परिवार और जीवन से संबंधित जानकारी उपलब्ध है।
हालाँकि कुछ घटनाओं के विवरण में क्षेत्रीय मतभेद मिलते हैं, लेकिन उनके जन्म, माता-पिता, सेवागढ़ (रामजी नायक का टांडा), माता श्री मारीम्मा की भक्ति तथा समाज सुधार के कार्यों को लेकर बंजारा समाज में व्यापक सहमति देखने को मिलती है।
जन्म तिथि को लेकर विभिन्न मत
संत सेवालाल महाराज की जन्म तिथि के संबंध में कुछ पुस्तकों और स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि उस समय जन्म पंजीकरण की आधुनिक व्यवस्था नहीं थी।
फिर भी बंजारा समाज में सर्वाधिक प्रचलित और व्यापक रूप से स्वीकार की जाने वाली तिथि 15 फरवरी 1739 है।
इसी तिथि पर—
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- तेलंगाना
- आंध्र प्रदेश
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
सहित देश के अनेक राज्यों में संत सेवालाल महाराज जयंती मनाई जाती है।
इस प्रकार सामाजिक परंपरा और सामूहिक स्वीकृति के आधार पर यही जन्म तिथि सबसे अधिक मान्य मानी जाती है।
सेवागढ़ (रामजी नायक का टांडा) का ऐतिहासिक महत्व
संत सेवालाल महाराज की जन्मभूमि सेवागढ़ बंजारा समाज के लिए अत्यंत पवित्र स्थान मानी जाती है।
यहीं भीमा नायक और धर्मणीबाई निवास करते थे और यहीं सेवाभाया का जन्म हुआ।
यह स्थान केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि बंजारा समाज के सामाजिक और धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यहाँ से संत सेवालाल महाराज ने अपने प्रारंभिक जीवन की शुरुआत की और बाद में पूरे भारत की यात्राओं पर निकले।
आज भी देशभर से श्रद्धालु सेवागढ़ पहुँचकर उनके जन्मस्थान के दर्शन करते हैं और इसे अपनी आस्था का केंद्र मानते हैं।
जन्म और बंजारा समाज का स्वाभिमान
संत सेवालाल महाराज के जन्म ने बंजारा समाज को एक नई पहचान दी।
उस समय समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था—
- निरंतर प्रवास
- व्यापारिक कठिनाइयाँ
- राजनीतिक अस्थिरता
- सामाजिक उपेक्षा
ऐसे समय में संत सेवालाल महाराज ने समाज में आत्मविश्वास, संगठन और सांस्कृतिक गौरव की भावना जगाई।
उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं पर गर्व करना ही समाज की सबसे बड़ी शक्ति है।
इसी कारण उनका जन्म बंजारा समाज के पुनर्जागरण की शुरुआत माना जाता है।
जन्म से जुड़ी लोक परंपराएँ
गोर बंजारा समाज में आज भी संत सेवालाल महाराज के जन्म दिवस पर अनेक पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इनमें प्रमुख हैं—
- माता श्री मारीम्मा की विशेष पूजा
- संत सेवालाल महाराज की प्रतिमा या चित्र का पूजन
- लापसी का प्रसाद
- हवन (होम)
- भजन एवं कीर्तन
- शोभायात्रा
- सामूहिक भोजन
- समाज जागरूकता कार्यक्रम
इन आयोजनों का उद्देश्य केवल धार्मिक श्रद्धा व्यक्त करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को संत सेवालाल महाराज के आदर्शों से परिचित कराना भी है।
जन्म से मिलने वाली प्रेरणा
संत सेवालाल महाराज का जन्म हमें यह सिखाता है कि महान व्यक्तित्व केवल राजमहलों में नहीं, बल्कि साधारण परिवारों में भी जन्म लेते हैं।
उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया कि—
- सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
- सत्य सबसे बड़ी शक्ति है।
- समाज की एकता सबसे बड़ी संपत्ति है।
- पशु-पक्षियों के प्रति दया भी धर्म का महत्वपूर्ण भाग है।
- कठिन परिस्थितियों में भी अपने संस्कार नहीं छोड़ने चाहिए।
इसी कारण उनका जीवन आज भी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आधुनिक समय में संत सेवालाल महाराज की प्रासंगिकता
आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब संत सेवालाल महाराज के विचार और भी अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
उन्होंने जिस—
- सामाजिक एकता,
- शिक्षा,
- आत्मनिर्भरता,
- नशामुक्त जीवन,
- सांस्कृतिक संरक्षण,
- नैतिकता,
- सेवा और मानवता
का संदेश दिया था, वही आज के समाज की भी आवश्यकता है।
उनके जीवन का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संत सेवालाल महाराज की जन्मभूमि का धार्मिक महत्व
आज सेवागढ़ और पोहरागढ़ दोनों ही बंजारा समाज की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं।
जहाँ सेवागढ़ को उनकी जन्मभूमि के रूप में सम्मान प्राप्त है, वहीं पोहरागढ़ उनकी समाधि स्थली होने के कारण लाखों श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ है।
इन दोनों स्थानों का दर्शन बंजारा समाज के लोग अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।
निष्कर्ष
संत श्री सेवालाल महाराज का जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि गोर बंजारा समाज के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की शुरुआत था। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब समाज को एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता थी जो उसे संगठित कर सके, आत्मसम्मान का मार्ग दिखा सके और धर्म को मानव सेवा से जोड़ सके।
15 फरवरी 1739 को सेवागढ़ में जन्मे सेवाभाया आगे चलकर संत श्री सेवालाल महाराज के रूप में पूरे भारत में विख्यात हुए। उनका जीवन सत्य, सेवा, करुणा, त्याग और समाज सुधार का अद्भुत उदाहरण है। आज भी उनका जन्म दिवस केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि बंजारा समाज की एकता, संस्कृति और गौरव का प्रतीक माना जाता है।
उनके जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि यदि व्यक्ति में सेवा की भावना, दृढ़ संकल्प और समाज के प्रति समर्पण हो, तो वह आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। संत सेवालाल महाराज का जन्म इसी अमर प्रेरणा का प्रतीक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों
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