संत सेवालाल महाराज का परिवार और वंशावली

संत श्री सेवालाल महाराज का जन्म एक धार्मिक, संस्कारी और समाजसेवी परिवार में हुआ था। उनके पिता भीमा नायक, माता धर्मणीबाई और दादा रामजी नायक ने उन्हें सेवा, सत्य, धर्म और नेतृत्व के संस्कार दिए। इस लेख में संत सेवालाल महाराज के परिवार, वंशावली, राठौड़ (भुकिया) गोत्र, रामावत पाड़ा, भाइयों, पारिवारिक परंपराओं तथा गोर बंजारा समाज में उनके परिवार के ऐतिहासिक योगदान का विस्तृत और प्रमाणिक वर्णन किया गया है।

Jul 11, 2026 - 18:26
अद्यतन: 5 hours ago
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संत सेवालाल महाराज का परिवार और वंशावली

संत श्री सेवालाल महाराज का व्यक्तित्व केवल उनकी आध्यात्मिक साधना या समाज सुधार कार्यों तक सीमित नहीं था। उनके महान जीवन के पीछे एक ऐसा परिवार था, जिसने धर्म, सेवा, नेतृत्व और सामाजिक उत्तरदायित्व की समृद्ध परंपरा को पीढ़ियों तक जीवित रखा। यही पारिवारिक संस्कार आगे चलकर संत सेवालाल महाराज के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बने।

गोर बंजारा समाज में परिवार केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा, गोत्र, पाड़ा और सामाजिक उत्तरदायित्व का आधार भी होता है। इसलिए संत सेवालाल महाराज के जीवन को समझने के लिए उनके परिवार और वंशावली का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

बंजारा समाज में वंशावली का महत्व

गोर बंजारा समाज में वंशावली (वंश परंपरा) का विशेष महत्व है। प्रत्येक परिवार अपने पूर्वजों, गोत्र, पाड़ा और कुल परंपरा को संजोकर रखता है। विवाह, धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक निर्णय और पारंपरिक रीति-रिवाजों में वंशावली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

बंजारा समाज में यह माना जाता है कि व्यक्ति की पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके गोत्र, पाड़ा और पूर्वजों से भी होती है। यही कारण है कि संत सेवालाल महाराज की वंशावली आज भी समाज में आदरपूर्वक स्मरण की जाती है।

संत सेवालाल महाराज का गोत्र और पाड़ा

लोक परंपराओं तथा उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार संत श्री सेवालाल महाराज राठौड़ (भुकिया) गोत्र के थे।

वे रामावत पाड़ा से संबंधित थे, जो बंजारा समाज की प्रतिष्ठित शाखाओं में से एक मानी जाती है।

उनका परिवार अपने धार्मिक जीवन, नेतृत्व क्षमता और समाज सेवा के लिए प्रसिद्ध था। समाज के लोग इस परिवार को सम्मान की दृष्टि से देखते थे और महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर उनकी सलाह को महत्व देते थे।

संत सेवालाल महाराज की वंशावली

बंजारा समाज की परंपराओं में संत सेवालाल महाराज की वंशावली इस प्रकार बताई जाती है—

  • घासीराम
  • रामजी नायक
  • भीमा नायक
  • संत श्री सेवालाल महाराज

यह वंशावली केवल पारिवारिक संबंधों का विवरण नहीं है, बल्कि बंजारा समाज में नेतृत्व की एक निरंतर परंपरा को भी दर्शाती है।

प्रत्येक पीढ़ी ने समाज के संगठन, व्यापार और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रामजी नायक – दूरदर्शी नेता

संत सेवालाल महाराज के दादा रामजी नायक बंजारा समाज के प्रभावशाली और सम्मानित नेता थे।

लोक परंपराओं के अनुसार उनके नेतृत्व में लगभग 360 बंजारा परिवार दक्षिण भारत की ओर आए। उनके साथ हजारों गाय-बैल, घोड़े और अन्य पशुधन भी था, जो उस समय समाज की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक था।

रामजी नायक ने वर्तमान आंध्र प्रदेश के गूटी क्षेत्र के निकट एक विशाल टांडा स्थापित किया। यही स्थान आगे चलकर रामजी नायक का टांडा और सेवागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उनकी संगठन क्षमता, न्यायप्रियता और दूरदर्शिता के कारण समाज में उनका अत्यधिक सम्मान था। उन्होंने अपने परिवार के साथ-साथ पूरे टांडा को एकजुट रखने का कार्य किया।

भीमा नायक – धार्मिक और न्यायप्रिय पिता

रामजी नायक के पुत्र भीमा नायक संत सेवालाल महाराज के पिता थे।

वे अपने पिता की तरह साहसी, अनुशासित और समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति थे। टांडा के लोग उन्हें एक न्यायप्रिय नेता के रूप में जानते थे। किसी भी सामाजिक विवाद में उनका निर्णय निष्पक्ष माना जाता था।

भीमा नायक का व्यक्तित्व केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं था। वे माता श्री मारीम्मा (जगदंबा) के अनन्य भक्त थे। प्रतिदिन पूजा-अर्चना करना, समाज के लोगों की सहायता करना और धार्मिक परंपराओं का पालन करना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था।

उनकी यही आस्था आगे चलकर संत सेवालाल महाराज के आध्यात्मिक जीवन की मजबूत नींव बनी।

धर्मणीबाई – आदर्श माता

संत सेवालाल महाराज की माता धर्मणीबाई अत्यंत धार्मिक, दयालु और संस्कारी महिला थीं।

वे पूरे परिवार में धार्मिक वातावरण बनाए रखती थीं और माता श्री मारीम्मा की नियमित पूजा करती थीं। लोक परंपराओं के अनुसार उनका स्वभाव अत्यंत सरल था और वे सभी लोगों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करती थीं।

धर्मणीबाई अपने बच्चों को बचपन से ही सत्य, ईमानदारी, करुणा और सेवा का पाठ पढ़ाती थीं। यही संस्कार संत सेवालाल महाराज के व्यक्तित्व में स्पष्ट दिखाई देते हैं।

भीमा नायक और धर्मणीबाई का विवाह

जब भीमा नायक विवाह योग्य हुए, तब उनके पिता रामजी नायक ने उनके लिए योग्य कन्या की खोज प्रारंभ की।

उन्हें जानकारी मिली कि कर्नाटक के चित्रदुर्ग क्षेत्र के निकट हीरोपुर टांडा में गोरम नायक नामक प्रतिष्ठित बंजारा नेता रहते हैं। उनकी पुत्री धर्मणीबाई अपने धार्मिक स्वभाव, विनम्रता और अच्छे संस्कारों के लिए प्रसिद्ध थीं।

बंजारा समाज की परंपराओं के अनुसार दोनों परिवारों के बीच विवाह का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। समाज के बुजुर्गों की उपस्थिति में सगाई सम्पन्न हुई और बाद में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह सम्पन्न हुआ।

यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो प्रतिष्ठित बंजारा परिवारों का सामाजिक और सांस्कृतिक मिलन था।

संतान प्राप्ति की प्रतीक्षा

विवाह के कई वर्षों बाद भी भीमा नायक और धर्मणीबाई को संतान प्राप्त नहीं हुई।

इस कारण दोनों ने माता श्री मारीम्मा की विशेष आराधना और तपस्या आरंभ की। वे पूर्ण विश्वास के साथ देवी की उपासना करते रहे।

बंजारा लोक परंपराओं में वर्णन मिलता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता श्री मारीम्मा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और शीघ्र ही धर्मणीबाई गर्भवती हुईं।

इस शुभ समाचार से पूरे टांडा में प्रसन्नता का वातावरण बन गया। समाज के लोगों ने इसे देवी की विशेष कृपा माना और सभी ने आने वाले शिशु के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

संत सेवालाल महाराज का जन्म और परिवार में नई आशा

माता श्री मारीम्मा की कृपा से जब भीमा नायक और धर्मणीबाई के घर पुत्र का जन्म हुआ, तब पूरे टांडा में आनंद का वातावरण छा गया। वर्षों की प्रतीक्षा और तपस्या के बाद प्राप्त इस बालक को परिवार ने देवी का आशीर्वाद माना।

बंजारा समाज में किसी भी परिवार में पहली संतान का जन्म केवल एक पारिवारिक सुख नहीं, बल्कि पूरे टांडा का उत्सव माना जाता था। इसलिए संत सेवालाल महाराज के जन्म की खुशी पूरे समाज ने मिलकर मनाई।

बालक का नाम सेवाभाया रखा गया। गोर बोली में "भाया" का अर्थ भाई होता है। आगे चलकर यह नाम पूरे बंजारा समाज में प्रेम और सम्मान का प्रतीक बन गया।

संत सेवालाल महाराज के भाई

संत सेवालाल महाराज अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान थे। उनके बाद परिवार में तीन और पुत्रों का जन्म हुआ।

लोक परंपराओं के अनुसार उनके भाइयों के नाम थे—

  • हापा (हंपा)
  • बद्दू
  • भानु (पूरा)

चारों भाइयों में सेवाभाया सबसे बड़े होने के कारण परिवार की अनेक जिम्मेदारियाँ उनके कंधों पर आने लगीं।

वे अपने छोटे भाइयों के लिए केवल बड़े भाई ही नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संरक्षक भी थे।

संयुक्त परिवार की परंपरा

उस समय बंजारा समाज में संयुक्त परिवार की परंपरा प्रचलित थी।

परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहते थे। पशुओं की देखभाल, व्यापार, धार्मिक कार्य, खेती और टांडा की सुरक्षा जैसे कार्य सामूहिक रूप से किए जाते थे।

बच्चों को बचपन से ही—

  • बड़ों का सम्मान,
  • अनुशासन,
  • परिश्रम,
  • सत्यवादिता,
  • पशु सेवा,
  • सामूहिक जीवन

का प्रशिक्षण दिया जाता था।

इसी वातावरण में संत सेवालाल महाराज का व्यक्तित्व विकसित हुआ।

धार्मिक वातावरण में हुआ पालन-पोषण

भीमा नायक और धर्मणीबाई दोनों माता श्री मारीम्मा के परम भक्त थे।

घर में प्रतिदिन पूजा, आरती और देवी का स्मरण किया जाता था।

बचपन से ही सेवाभाया अपने माता-पिता के साथ पूजा में बैठते थे। धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी विशेष रुचि थी।

धीरे-धीरे यह भक्ति उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा बन गई।

बचपन से सेवा भावना

संत सेवालाल महाराज का स्वभाव बचपन से ही अत्यंत सरल और दयालु था।

वे किसी भी गरीब, वृद्ध या असहाय व्यक्ति की सहायता करने का प्रयास करते थे।

यदि किसी परिवार के पशु बीमार हो जाते, तो वे स्वयं उनकी सेवा करते।

यदि किसी परिवार को भोजन की आवश्यकता होती, तो अपने घर का अन्न भी बाँट देते।

इसी सेवा भावना के कारण लोग उन्हें बचपन से ही विशेष सम्मान देने लगे।

पशुधन ही परिवार की सबसे बड़ी संपत्ति

उस समय बंजारा समाज की आर्थिक व्यवस्था मुख्यतः पशुधन पर आधारित थी।

भीमा नायक के परिवार के पास—

  • गाय,
  • बैल,
  • घोड़े,
  • भेड़,
  • बकरियाँ

की बड़ी संख्या थी।

इन्हीं पशुओं के माध्यम से व्यापार किया जाता था।

बचपन से ही संत सेवालाल महाराज पशुओं की देखभाल में अपने पिता का सहयोग करते थे।

यही कारण है कि आगे चलकर उन्होंने पशु संरक्षण और जीवों के प्रति करुणा को अपने जीवन का महत्वपूर्ण संदेश बनाया।

परिवार से मिले नेतृत्व के संस्कार

रामजी नायक, भीमा नायक और परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्यों का समाज में विशेष सम्मान था।

घर में अक्सर टांडा से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होती थी।

  • व्यापार कैसे बढ़ाया जाए,
  • समाज को कैसे संगठित रखा जाए,
  • विवादों का समाधान कैसे किया जाए,
  • परंपराओं की रक्षा कैसे की जाए,

जैसे विषयों पर सेवाभाया बचपन से ही सुनते और सीखते रहे।

यही अनुभव आगे चलकर उन्हें एक कुशल समाज सुधारक और आध्यात्मिक नेता बनने में सहायक बने।

माता धर्मणीबाई से मिले संस्कार

धर्मणीबाई का प्रभाव संत सेवालाल महाराज के जीवन पर अत्यंत गहरा था।

वे अपने बच्चों को सदैव सिखाती थीं—

  • कभी झूठ मत बोलो।
  • किसी का अधिकार मत छीनो।
  • भूखे को भोजन दो।
  • पशुओं पर दया करो।
  • माता-पिता और गुरु का सम्मान करो।
  • देवी पर अटूट विश्वास रखो।

इन शिक्षाओं का प्रभाव संत सेवालाल महाराज के संपूर्ण जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है।

पिता भीमा नायक से मिली प्रेरणा

भीमा नायक केवल पिता ही नहीं, बल्कि सेवाभाया के प्रथम गुरु भी थे।

उन्होंने अपने पुत्र को—

  • साहस,
  • अनुशासन,
  • समाज सेवा,
  • नेतृत्व,
  • न्यायप्रियता,
  • कठिन परिश्रम

का महत्व सिखाया।

वे चाहते थे कि उनका पुत्र केवल परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का नेतृत्व करे।

बाद में यही सपना साकार हुआ।

परिवार और समाज का गहरा संबंध

बंजारा समाज में किसी भी परिवार की प्रतिष्ठा केवल उसकी संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके आचरण से तय होती थी।

भीमा नायक का परिवार हमेशा समाज के सुख-दुख में सबसे आगे रहता था।

किसी परिवार में विवाह हो, संकट आए या कोई सामाजिक आयोजन हो—भीमा नायक का परिवार हमेशा सक्रिय भूमिका निभाता था।

यही कारण था कि सेवाभाया को बचपन से ही समाज सेवा का व्यावहारिक अनुभव मिला।

आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत

जैसे-जैसे संत सेवालाल महाराज बड़े होते गए, उनकी रुचि सांसारिक विषयों की अपेक्षा आध्यात्मिक साधना में अधिक बढ़ने लगी।

वे प्रतिदिन—

  • कालो कुंड में स्नान करते,
  • माता श्री मारीम्मा की पूजा करते,
  • भगवान चेन्नकेशव के दर्शन करते,
  • पशुओं की सेवा करते,
  • और समय मिलने पर ध्यान एवं भजन में लीन रहते।

परिवार ने उनकी इस आध्यात्मिक प्रवृत्ति का सदैव सम्मान किया और उन्हें धर्म मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

वंश परंपरा और सामाजिक नेतृत्व

संत श्री सेवालाल महाराज का परिवार केवल एक साधारण बंजारा परिवार नहीं था, बल्कि वह समाज में नेतृत्व, धार्मिक आस्था और संगठन का केंद्र माना जाता था। उनके पूर्वजों ने सामाजिक एकता, व्यापारिक व्यवस्था और पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी विरासत ने संत सेवालाल महाराज के व्यक्तित्व को आकार दिया।

बंजारा समाज में नायक परिवारों की विशेष जिम्मेदारी होती थी। वे केवल अपने परिवार का नहीं, बल्कि पूरे टांडा के लोगों का मार्गदर्शन करते थे। सामाजिक विवादों का समाधान, यात्राओं की योजना, व्यापार की सुरक्षा और धार्मिक परंपराओं का पालन सुनिश्चित करना उनके प्रमुख दायित्वों में शामिल था। संत सेवालाल महाराज ने बचपन से ही इन व्यवस्थाओं को निकट से देखा और समझा।

परिवार से मिले संस्कारों का प्रभाव

संत सेवालाल महाराज के जीवन में पारिवारिक संस्कारों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

अपने माता-पिता से उन्होंने सीखा—

  • सत्य का पालन करना।
  • सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार करना।
  • गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता करना।
  • पशु-पक्षियों के प्रति दया रखना।
  • धर्म को केवल पूजा तक सीमित न रखकर सेवा का माध्यम बनाना।

इन्हीं मूल्यों के कारण आगे चलकर वे केवल धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए।

वंशावली से मिली सामाजिक पहचान

गोर बंजारा समाज में व्यक्ति की पहचान उसके नाम के साथ-साथ उसके गोत्र, पाड़ा और वंश से भी होती है।

संत सेवालाल महाराज राठौड़ (भुकिया) गोत्र तथा रामावत पाड़ा से संबंधित थे। आज भी समाज में उनकी वंश परंपरा का उल्लेख श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है।

हालाँकि संत सेवालाल महाराज ने कभी अपने परिवार या वंश का अभिमान नहीं किया। उन्होंने सदैव यही संदेश दिया कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म, चरित्र और सेवा भावना से होती है।

परिवार से समाज तक की यात्रा

संत सेवालाल महाराज ने अपने परिवार से प्राप्त संस्कारों को केवल अपने जीवन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पूरे बंजारा समाज को अपना परिवार माना।

वे जहाँ भी गए, लोगों को एकता, भाईचारे और परस्पर सहयोग का संदेश दिया। उन्होंने समाज को जातीय, क्षेत्रीय और व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर संगठित रहने की प्रेरणा दी।

इसी कारण आज भी उन्हें पूरे गोर बंजारा समाज का कुलगुरु और आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना जाता है।

इतिहास में परिवार का योगदान

संत सेवालाल महाराज के परिवार का योगदान केवल उनके जन्म तक सीमित नहीं था।

  • रामजी नायक ने दक्षिण भारत में बंजारा समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • भीमा नायक ने न्यायप्रिय नेतृत्व और धार्मिक जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया।
  • धर्मणीबाई ने अपने संस्कारों से ऐसे पुत्र का निर्माण किया, जिसने पूरे समाज को नई दिशा दी।

इस प्रकार तीन पीढ़ियों की यह परंपरा संत सेवालाल महाराज के रूप में अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँची।

वर्तमान समय में वंशावली का महत्व

आज भी गोर बंजारा समाज में वंशावली का विशेष महत्व है।

विवाह, पारिवारिक परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक आयोजनों में गोत्र और वंश की जानकारी आवश्यक मानी जाती है।

साथ ही, यह नई पीढ़ी को अपने इतिहास, पूर्वजों और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का माध्यम भी है।

संत सेवालाल महाराज का परिवार इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि मजबूत पारिवारिक संस्कार समाज के महान नेतृत्व की नींव बन सकते हैं।

परिवार से मिलने वाली प्रमुख शिक्षाएँ

संत सेवालाल महाराज के परिवार से हमें अनेक महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सीखने को मिलते हैं—

  • परिवार में धार्मिक और नैतिक वातावरण बच्चों के व्यक्तित्व को मजबूत बनाता है।
  • माता-पिता के संस्कार जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।
  • नेतृत्व की शुरुआत परिवार से होती है।
  • समाज सेवा का भाव बचपन से विकसित किया जा सकता है।
  • विनम्रता और सेवा किसी भी वंश से अधिक महान होती है।

संत सेवालाल महाराज का संदेश

संत सेवालाल महाराज ने कभी अपने कुल, वंश या परिवार के आधार पर सम्मान प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म, सेवा, त्याग और समाज के प्रति समर्पण से प्राप्त होती है।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि परिवार में अच्छे संस्कार, अनुशासन और मानवता की भावना हो, तो वही परिवार समाज के लिए महान व्यक्तित्वों का निर्माण कर सकता है।

निष्कर्ष

संत श्री सेवालाल महाराज का परिवार गोर बंजारा समाज की धार्मिक आस्था, नेतृत्व, सेवा और सांस्कृतिक परंपरा का श्रेष्ठ उदाहरण था। उनके दादा रामजी नायक, पिता भीमा नायक और माता धर्मणीबाई ने उन्हें ऐसे संस्कार दिए, जिन्होंने आगे चलकर उन्हें समाज का महान संत, समाज सुधारक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक बनाया।

उनकी वंशावली केवल पारिवारिक इतिहास नहीं, बल्कि बंजारा समाज के सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों की जीवंत धरोहर है। आज भी उनका परिवार और जीवन नई पीढ़ी को सत्य, सेवा, एकता, करुणा और समाज के प्रति समर्पण का संदेश देता है।

इसलिए संत सेवालाल महाराज के परिवार और वंशावली का अध्ययन केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों

संत श्री सेवालाल महाराज के पिता भीमा नायक थे। वे गोर बंजारा समाज के सम्मानित नेता, न्यायप्रिय व्यक्तित्व और माता श्री मारीम्मा के परम भक्त थे।

उनकी माता धर्मणीबाई थीं। वे धार्मिक, दयालु और संस्कारी महिला थीं, जिन्होंने संत सेवालाल महाराज को सत्य, सेवा, करुणा और धर्म के संस्कार दिए।

संत सेवालाल महाराज के दादा रामजी नायक थे। बंजारा समाज की परंपराओं के अनुसार उन्होंने लगभग 360 बंजारा परिवारों का नेतृत्व करते हुए दक्षिण भारत में टांडा बसाया और समाज को संगठित किया।

संत सेवालाल महाराज राठौड़ (भुकिया) गोत्र तथा रामावत पाड़ा से संबंधित थे। यह बंजारा समाज की प्रतिष्ठित वंश परंपराओं में से एक मानी जाती है।

लोक परंपराओं के अनुसार संत सेवालाल महाराज के तीन छोटे भाई थे—हापा (हंपा), बद्दू और भानु (पूरा)। वे परिवार की सबसे बड़ी संतान थे।

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