बंजारा समाज का ST आरक्षण आंदोलन: इतिहास, वर्तमान स्थिति, संवैधानिक प्रक्रिया और भविष्य की रणनीति

बंजारा समाज का अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण आंदोलन लगभग 75 वर्षों से निरंतर जारी है। इस लेख में 1937 से लेकर वर्तमान तक के ऐतिहासिक आंदोलनों, प्रमुख नेताओं के प्रयासों, महाराष्ट्र की आरक्षण व्यवस्था में हुए बदलावों, ST आरक्षण प्राप्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया तथा बंजारा समाज की वर्तमान मांग का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। साथ ही आंदोलन की भविष्य की रणनीति और विभिन्न आयोगों की सिफारिशों पर भी प्रकाश डाला गया है।

Jul 11, 2026 - 11:55
अद्यतन: 5 hours ago
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बंजारा समाज का ST आरक्षण आंदोलन: इतिहास, वर्तमान स्थिति, संवैधानिक प्रक्रिया और भविष्य की रणनीति

बंजारा समाज की ST आरक्षण मांग का इतिहास

1) वर्ष 1937

पद्मश्री रामसिंहजी भानावत एवं अन्य प्रतिनिधियों ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा तैयार किए गए प्रारूप के साथ तत्कालीन भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो से मुलाकात की और क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (अपराधी जनजाति कानून) को समाप्त करने की पहली मांग रखी।

2) वर्ष 1947

महानायक वसंतराव नाईक साहेब, पद्मश्री रामसिंहजी भानावत एवं अन्य नेताओं ने भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर से चार बार मुलाकात कर बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने की मांग की।

3) 19 अगस्त 1949

पद्मश्री रामसिंहजी भानावत एवं अन्य प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार वल्लभभाई पटेल से मुलाकात कर क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को समाप्त करने की मांग की।

इस मांग के परिणामस्वरूप भारत सरकार ने 28 सितंबर 1948 को अय्यंगार समिति का गठन किया। इस समिति ने 31 दिसंबर 1950 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इसके बाद 31 अगस्त 1952 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सोलापुर में जाकर अपराधी जनजातियों के चारों ओर लगी कांटेदार तार की बाड़ को हटाकर उन्हें इस कानून से मुक्त किया। इसके पश्चात इन समुदायों को विमुक्त जाति (Denotified Tribes) के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।

4) वर्ष 1950–1952

भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, सरदार हुकम सिंह तथा जयपाल सिंह ने संसद में बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग उठाई।

5) 26 सितंबर 1952

डॉ. पंजाबराव देशमुख के नेतृत्व में महानायक वसंतराव नाईक साहेब, पद्मश्री रामसिंहजी भानावत, चंद्रम चव्हाण गुरुजी, सखाराम मुडे, लोकनेता बलिराम पाटिल मंडविकार, दगडूसिंह राठौड़, स्वतंत्रता सेनानी बाबूसिंह राठौड़ सहित 15 प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात कर संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत विमुक्त समुदायों के लिए आयोग गठित करने की मांग की।

इसके परिणामस्वरूप 1953 में काका कालेलकर आयोग का गठन किया गया।

6) अखिल भारतीय बंजारा सेवा संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन

अखिल भारतीय बंजारा सेवा संघ द्वारा निम्नलिखित राष्ट्रीय अधिवेशनों में बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग लगातार उठाई गई—

  • डिग्रस (31 जनवरी 1953)
  • सोमगढ़ (11, 12 एवं 13 अप्रैल 1954)
  • चालीसगांव (15 मार्च 1955)
  • गुलबर्गा (11 फरवरी 1960)
  • पेंकुंठा (13 जनवरी 1964)
  • वारंगल (10 अप्रैल 1965)
  • पुसद (13 एवं 14 जनवरी 1981)
  • औरंगाबाद (1 एवं 2 जून 1985)
  • बीजापुर (6 एवं 7 फरवरी 1988)
  • डिग्रस (31 जनवरी 2003)
  • बारशी टाकली (1 एवं 2 जून 2012)

इन 12 राष्ट्रीय अधिवेशनों में प्रमुख मांग बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की रही तथा इस विषय पर केंद्र सरकार के साथ निरंतर पत्राचार और प्रयास किए गए।

7) वर्ष 1969

महानायक वसंतराव नाईक साहेब, पद्मश्री रामसिंहजी भानावत तथा स्वतंत्रता सेनानी बाबूसिंह राठौड़ ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर तथा मध्य प्रदेश के उज्जैन में विशाल जनसभाओं का आयोजन कर बंजारा समाज के लिए ST आरक्षण के समर्थन में जनजागरण अभियान चलाया।

8) 11 दिसंबर 1969 से 30 दिसंबर 1969

पद्मश्री रामसिंहजी भानावत एवं स्वतंत्रता सेनानी बाबूसिंह राठौड़ ने पूरे भारत का दौरा कर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि बंजारा समाज मूल रूप से एक जनजातीय (Tribal) समुदाय है।

9) 12 नवंबर 1969

दिल्ली में बंजारा समाज का एक विशाल राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया गया, जिसमें महानायक वसंतराव नाईक साहेब, पद्मश्री रामसिंहजी भानावत, स्वतंत्रता सेनानी बाबूसिंह राठौड़ एवं अन्य नेताओं ने प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग की।

10) वर्ष 1969, 1972 एवं 1976

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने बंजारा समाज को आरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से 1969, 1972 तथा 1976 में संसद में विधेयक प्रस्तुत किए।

11) वर्ष 1971

तेलंगाना में अमरसिंह तिलावत, रविंद्र नाईक तथा महेंद्र नाईक के नेतृत्व में ए.पी. बंजारा स्टूडेंट एक्शन कमेटी ने अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग को लेकर व्यापक छात्र आंदोलन चलाया।

12) वर्ष 1975

महान संत डॉ. रामराव बापू महाराज ने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी से मुलाकात कर बंजारा समाज के लिए आरक्षण की मांग की। इस प्रयास का लाभ आंध्र प्रदेश के बंजारा समाज को प्राप्त हुआ।

13) वर्ष 1975

महानायक वसंतराव नाईक साहेब, पद्मश्री रामसिंहजी भानावत तथा बाबूसिंहजी राठौड़ ने प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से भेंट कर पुनः बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग रखी।

14) 25 अप्रैल 1988

प्रो. मोतीराज राठौड़ ने बंजारा एवं विमुक्त-घुमंतू समाज के संवैधानिक अधिकारों के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में केस क्रमांक 3375 दायर किया।

15) 31 मार्च 1989

सोलापुर में महाराष्ट्र सरकार की ओर से श्री शरद पवार ने प्रो. मोतीराज राठौड़ के साथ मिलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बंजारा समाज के संवैधानिक अधिकारों की मांग संबंधी आठ पृष्ठों का ज्ञापन सौंपा।

16) 5 जनवरी 1991

पूर्व सांसद हरिभाऊ राठौड़ एवं लेखक राकेश जाधव ने बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग को लेकर मुंबई के आज़ाद मैदान में आमरण अनशन एवं आंदोलन प्रारंभ किया। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इस आंदोलन को निरंतर जारी रखा।

17) 1 अगस्त 2002

श्री रणजीत नाईक एवं लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ ने केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात कर बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग रखी।

18) 24 अक्टूबर 2004

औरंगाबाद में आयोजित राज्यव्यापी आंदोलन के दौरान प्रो. मोतीराज राठौड़ ने अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग को जोरदार तरीके से उठाया।

19) वर्ष 2004 से 2009

पूर्व सांसद हरिभाऊ राठौड़ ने संसद में बार-बार बंजारा समाज के लिए अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग उठाई, जिसके परिणामस्वरूप रेणके आयोग का गठन किया गया।

20) वर्ष 2005

महान संत डॉ. रामराव बापू महाराज एवं महंत संजय महाराज ने दिल्ली के जंतर-मंतर तथा मुंबई के आज़ाद मैदान में पहला आमरण अनशन आयोजित किया तथा समय-समय पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग को आगे बढ़ाया।

21) 5 दिसंबर 2005

प्रो. मोतीराज राठौड़, दिगंबरभाऊ राठौड़, बलीभाऊ राठौड़, सुभाषभाऊ राठौड़, प्रो. मोहन चव्हाण, यादीकर पंजाबराव चव्हाण एवं अन्य नेताओं ने नागपुर के शीतकालीन अधिवेशन के दौरान दस हजार लोगों का विशाल मोर्चा निकाला। इस मोर्चे में क्रीमी लेयर कानून समाप्त करने तथा बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग की गई।

22) 12 दिसंबर 2012

नागपुर संघर्ष वाहिनी एवं भटके-विमुक्त संघर्ष परिषद के नेतृत्व में नागपुर शीतकालीन अधिवेशन के दौरान अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग को लेकर विशाल मोर्चा निकाला गया।

23)

श्री मनोहरभाऊ नाईक एवं रामजीभाऊ आड़े ने मुंबई में तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख से मुलाकात कर बंजारा समाज की मांग को आगे बढ़ाया।

24) वर्ष 2015 से 2024

राष्ट्रीय बंजारा विकास मिशन इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री देवराव राठौड़ ने प्रधानमंत्री एवं विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अनेक ज्ञापन सौंपे तथा बंजारा समाज के आरक्षण के लिए अनेक आंदोलन एवं प्रदर्शन आयोजित किए।

25)

पिछले लगभग 75 वर्षों में बंजारा समाज के अनेक सामाजिक संगठनों ने समय-समय पर रैलियाँ, आंदोलन, धरने एवं आमरण अनशन आयोजित कर अनुसूचित जनजाति आरक्षण की मांग को निरंतर जीवित रखा।

महाराष्ट्र में बंजारा समाज का आरक्षण कैसे समाप्त हुआ?

1) वर्ष 1956

भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद, जो बंजारा समाज पहले जनजातीय आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहा था, उसे महाराष्ट्र में विमुक्त जाति (Denotified Tribes) की श्रेणी में रखा गया।

2) वर्ष 1956

राज्यों के पुनर्गठन के बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन समुदायों के संबंध में सभी राज्यों से रिपोर्ट मांगी जिन्हें अभी तक संवैधानिक सुविधाएँ प्राप्त नहीं हुई थीं। लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने उस समय इस विषय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

3) 18 अगस्त 1991

वंजारी-बंजारा विवाद के कारण वंजारी समाज को विमुक्त एवं घुमंतू जाति आरक्षण श्रेणी में शामिल किया गया।

4) 16 नवंबर 1992

इंद्रा साहनी (मंडल) प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया।

5) 22 जनवरी 2004

विमुक्त एवं घुमंतू समाज पर क्रीमी लेयर का प्रावधान लागू कर दिया गया।

6) 22 फरवरी 2005

श्री विजय घोगरे ने बॉम्बे हाईकोर्ट में पदोन्नति पर रोक लगाने की मांग करते हुए याचिका दायर की।

7) 1 मार्च 2006

महाराष्ट्र सरकार ने विमुक्त जाति, पूर्व अपराधी जनजाति एवं घुमंतू जनजाति की श्रेणियों में कई नई जातियों को शामिल किया।

8) 9 मार्च 2007

नागराज केस (क्रमांक 8452/04) में सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षित पदों को भरने पर रोक लगा दी।

9) "राजपूत भामटा" नाम की समानता का लाभ उठाकर अनेक फर्जी राजपूत, मीणा तथा अन्य समुदायों के लोगों ने इस आरक्षण व्यवस्था में प्रवेश कर लिया, जिसके कारण विमुक्त एवं घुमंतू समाज के आरक्षण का वास्तविक लाभ काफी हद तक समाप्त हो गया।

महाराष्ट्र में विमुक्त जाति एवं घुमंतू जनजातियों की वर्तमान आरक्षण व्यवस्था

वर्ष 1965 की आरक्षण व्यवस्था

(9 अप्रैल 1965 को बी. डी. देशमुख समिति की सिफारिशों के आधार पर लागू। तत्कालीन मुख्यमंत्री – श्री वसंतराव नाईक साहेब)

  • अनुसूचित जाति (SC) – 13%
  • अनुसूचित जनजाति (ST) – 7%
  • विमुक्त जाति एवं घुमंतू जनजाति (VJNT) – 4%
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) – 10%

कुल आरक्षण – 34%

वर्ष 1992 में आरक्षण में परिवर्तन

(तत्कालीन मुख्यमंत्री – श्री सुधाकरराव नाईक)

  • अनुसूचित जाति (SC) – 13%
  • अनुसूचित जनजाति (ST) – 7%
  • विमुक्त एवं घुमंतू जनजाति (VJNT) – 6%
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) – 10%

कुल आरक्षण – 36%

23 मार्च 1994 के बाद आरक्षण का विभाजन

(तत्कालीन मुख्यमंत्री – श्री शरद पवार)

  • अनुसूचित जाति (SC) – 13%
  • अनुसूचित जनजाति (ST) – 7%
  • विमुक्त जाति (श्रेणी A-14 एवं समान जातियाँ) – 3%
  • घुमंतू जनजाति (श्रेणी B – जनवरी 1990 से पूर्व की 28 एवं समान जातियाँ) – 2.5%
  • घुमंतू जनजाति (श्रेणी C – धनगर एवं समान जातियाँ) – 3.5%
  • घुमंतू जनजाति (श्रेणी D – वंजारी एवं समान जातियाँ) – 2%
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) – 19%

कुल आरक्षण – 50%

बंजारा समाज की आरक्षण संबंधी मांग

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अनुसार पिछड़े वर्गों को आरक्षण प्रदान करना राज्य का दायित्व है।

भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के कारण पूर्व हैदराबाद राज्य के 16 जिलों में से 11 जिलों के बंजारा समाज को आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में अनुसूचित जनजाति का लाभ प्राप्त हुआ।

लेकिन सी.पी. एंड बरार (CP & Berar) के 8 जिले तथा पूर्व हैदराबाद राज्य के 5 जिले महाराष्ट्र में शामिल होने के बाद अनुसूचित जनजाति के लाभ से वंचित रह गए।

जबकि संविधान के अनुच्छेद 15(4), राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956, लोकुर समिति (1965) तथा न्यायमूर्ति बापट आयोग (2004) की सिफारिशों के अनुसार बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का लाभ मिलना चाहिए था।

इसी कारण बंजारा समाज की मांग है कि—

  • वर्तमान अनुसूचित जनजाति के 7 प्रतिशत आरक्षण में कोई हिस्सा नहीं चाहिए।
  • पहले की तरह विमुक्त जनजाति के लिए पृथक 5.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।
  • साथ ही बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल किया जाए।

अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने की संवैधानिक प्रक्रिया

किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए निम्न प्रक्रिया अपनाई जाती है—

  1. राज्य सरकार द्वारा अनुशंसा।
  2. राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की अनुशंसा।
  3. भारत के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General of India) की अनुशंसा।
  4. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की अनुशंसा।
  5. केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) की स्वीकृति।
  6. संसद (लोकसभा एवं राज्यसभा) द्वारा विधेयक पारित होना।
  7. महामहिम राष्ट्रपति की स्वीकृति।

विभिन्न आयोगों की सिफारिशें

निम्न आयोगों एवं अधिनियमों ने भी बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा की है—

  • लोकुर आयोग
  • मंडल आयोग
  • सच्चर आयोग
  • न्यायमूर्ति बापट आयोग (2004)
  • राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956

इनके अनुसार बंजारा समाज अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित पाँचों मानदंडों को पूरा करता है।

समय-समय पर पद्मश्री रामसिंहजी भानावत, महानायक वसंतराव नाईक साहेब, महान संत डॉ. रामराव बापू महाराज, रणजीत नाईक, अखिल भारतीय बंजारा सेवा संघ, प्रो. मोतीराज राठौड़, सांसद हरिभाऊ राठौड़, संघर्ष वाहिनी श्री वाघमारे तथा भटके-विमुक्त संघर्ष समिति सहित अनेक संगठनों ने यह मांग लगातार उठाई है।

सरकारी अभिलेखों, आयोगों की सिफारिशों तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर बंजारा समाज अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की सभी आवश्यक शर्तों को पूरा करता है।

हैदराबाद गजट तथा सी.पी. एंड बरार गजट सहित सरकार के पास पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध हैं। इसलिए बंजारा समाज का मत है कि अब केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है और सरकार को शीघ्र निर्णय लेकर बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करना चाहिए।

ST आरक्षण प्रदान करने में केंद्र एवं राज्य सरकार की भूमिका

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342(2) के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की सूची में संशोधन करने का अधिकार संसद को प्राप्त है।

किन्तु यदि राज्य सरकार अपनी अनुशंसा केंद्र सरकार को भेजती है, तो केंद्र सरकार बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर सकती है।

30 सितंबर 2024 को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण (Sub-Classification) संबंधी आदेश जारी किए गए।

यदि महाराष्ट्र सरकार अनुसूचित जनजाति आरक्षण का उप-वर्गीकरण लागू करती है, तो बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का अवसर उपलब्ध हो सकता है। इसलिए वर्तमान समय में यह मांग पहले की तुलना में अधिक व्यावहारिक मानी जा रही है।

बंजारा आंदोलन की रणनीति कैसी हो?

बंजारा समाज के वीर भाईयों एवं बहनों,

जालना और बीड में आयोजित रैलियों में अभूतपूर्व जनसमर्थन देखने को मिला। अन्य जिलों में भी समाज ने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक तरीके से एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद की है।

ऐसी स्थिति में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है—

  • रैली पूर्णतः शांतिपूर्ण एवं संविधान के दायरे में आयोजित की जाए।
  • यदि राजनीतिक नेता उपस्थित हों, तो उन्हें मंच से भाषण देने की अनुमति न दी जाए।
  • समापन सत्र में केवल दो या तीन जानकार एवं विषय विशेषज्ञ व्यक्तियों को ही बोलने का अवसर दिया जाए।
  • कोई भी व्यक्ति सरकारी संपत्ति को नुकसान न पहुँचाए तथा पुलिस प्रशासन पर अनावश्यक दबाव न बनाए।
  • मीडिया के सामने केवल आरक्षण विषय की जानकारी रखने वाले गोर बुद्धिजीवी ही समाज का पक्ष रखें।
  • बिना सामूहिक निर्णय के कोई भी व्यक्ति आमरण अनशन प्रारंभ न करे, जिससे उसके परिवार पर संकट उत्पन्न हो।
  • सभी संगठनों के समन्वय से आंदोलन चलाया जाए तथा एक ही दिन अलग-अलग स्थानों पर कई रैलियाँ आयोजित करने से बचा जाए।

संदर्भ (References)

  • आरक्षण का इतिहास — यादीकर पंजाबराव चव्हाण
  • डॉ. सुभाष राठौड़ (प्रख्यात साहित्यकार, पुणे) का लेख
  • डॉ. अनिल सालुंके (राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय राजपूत भामटा युवक आघाड़ी, मुंबई) का लेख
  • श्री आशीष राठौड़ (महिला एवं बाल विकास अधिकारी) का लेख
  • श्री अरविंद एस. जाधव (शिक्षक एवं गोर चिंतक, माहूर) का लेख
  • श्री बाबासाहेब गलत (संयोजक, भटके-विमुक्त संघर्ष परिषद, रोहणा, जिला वर्धा)
  • सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं प्रिंट मीडिया में प्रकाशित समाचार

महाराष्ट्र राज्य में गोर–बंजारा आंदोलन

  • छत्रपति संभाजीनगर – 12 सितंबर
  • जालना – 15 सितंबर
  • बीड – 15 सितंबर
  • तुलजापुर – 16 सितंबर
  • चालीसगांव – 17 सितंबर
  • मनोरा – 17 सितंबर
  • सोलापुर – 17 सितंबर
  • किनवट–माहूर – 18 सितंबर
  • पुणे – 18 सितंबर
  • हिंगोली – 19 सितंबर
  • कन्नड़ – 19 सितंबर
  • महागांव – 19 सितंबर
  • बांद्रा (पूर्व), मुंबई – 19 सितंबर
  • उमरगा – 23 सितंबर
  • अर्णी – 24 सितंबर
  • बुलढाणा – 25 सितंबर
  • पुसद – 25 सितंबर
  • राजगुरुनगर (खेड़), पुणे – 25 सितंबर
  • दरव्हा – 26 सितंबर
  • औसा – 26 सितंबर
  • नांदेड़ – 29 सितंबर
  • वाशिम – 29 सितंबर
  • यवतमाल – 29 सितंबर
  • धाराशिव – 29 सितंबर
  • राजुरा – 29 सितंबर
  • जीवती (चंद्रपुर) – 29 सितंबर
  • ठाणे – 3 अक्टूबर
  • जळगांव – 7 अक्टूबर

(साभार: सोशल मीडिया)

जय सेवा... जय वसंत!

— यादीकर पंजाबराव चव्हाण
(गोर शोधकर्ता, पुसद)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों

बंजारा समाज की प्रमुख मांग है कि उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल किया जाए। समाज का कहना है कि वह वर्तमान ST के 7% आरक्षण में हिस्सा नहीं मांग रहा, बल्कि पूर्व की तरह अलग से 5.5% आरक्षण के साथ ST का दर्जा चाहता है।

इस प्रक्रिया में राज्य सरकार की अनुशंसा, राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग, भारत के रजिस्ट्रार जनरल, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, केंद्रीय मंत्रिमंडल, संसद की स्वीकृति तथा अंत में राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है।

लोकुर आयोग, मंडल आयोग, सच्चर आयोग, न्यायमूर्ति बापट आयोग (2004) तथा राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 सहित विभिन्न आयोगों और दस्तावेजों में बंजारा समाज के संबंध में महत्वपूर्ण सिफारिशें की गई हैं।

नहीं। बंजारा समाज का ST आरक्षण आंदोलन लगभग 75 वर्षों से लगातार चल रहा है। इस दौरान अनेक सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और समाज सुधारकों ने सरकार के समक्ष ज्ञापन, आंदोलन, रैलियां और आमरण अनशन आयोजित किए हैं।

पद्मश्री रामसिंहजी भानावत, महानायक वसंतराव नाईक साहेब, डॉ. रामराव बापू महाराज, प्रो. मोतीराज राठौड़, सांसद हरिभाऊ राठौड़, रणजीत नाईक तथा अनेक सामाजिक संगठनों ने समय-समय पर ST आरक्षण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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