भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड जीवन परिचय | गोरमाटी भाषा और साहित्य के योद्धा

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड गोर बंजारा समाज के प्रसिद्ध साहित्यकार, समाजसेवी और गोरमाटी भाषा के समर्पित प्रचारक हैं। 2 अप्रैल 1950 को महाराष्ट्र के नांदेड जिले के चिंचखेड गांव में जन्मे मोहन जी ने अपना जीवन समाज सेवा, साहित्य सृजन और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए समर्पित किया। उन्होंने ग्राम विकास, किसान आंदोलनों, बंजारा समाज के अधिकारों और गोरमाटी भाषा के संवर्धन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

Jul 18, 2026 - 11:43
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भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड जीवन परिचय | गोरमाटी भाषा और साहित्य के योद्धा

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड – गोरमाटी भाषा, साहित्य और समाज सेवा के महान योद्धा

गोर बंजारा समाज के इतिहास, संस्कृति, भाषा और साहित्य के संरक्षण में जिन महान व्यक्तित्वों ने अपना जीवन समर्पित किया है, उनमें भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि एक चिंतक, लेखक, साहित्यकार, भाषा प्रेमी और समाज सुधारक के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन गोरमाटी बोलीभाषा, गोर बंजारा संस्कृति और समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए बिताया।

अपने लेखन, आंदोलनों और सामाजिक कार्यों के माध्यम से उन्होंने गोर समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। ग्रामीण जीवन से निकलकर साहित्य और सामाजिक आंदोलन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाले मोहन गणुजी नायक राठोड आज समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

प्रारंभिक जीवन और परिवार

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का जन्म 2 अप्रैल 1950 को महाराष्ट्र के नांदेड जिले के किनवट तालुका स्थित चिंचखेड गांव में हुआ। उनका पूरा नाम मोहन गणुजी नायक राठोड है, जबकि साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में वे अपने उपनाम "भीमणीपुत्र" के नाम से प्रसिद्ध हैं।

उनका जन्म एक साधारण श्रमजीवी किसान परिवार में हुआ। उनके पिता गणुजी नायक हारावत घराने से थे और माता भीमणीबाई सिंगोडा परिवार से थीं। उनके माता-पिता मेहनती किसान थे और उन्होंने अपने परिश्रम से परिवार का पालन-पोषण किया।

मोहन जी जब मात्र डेढ़ से दो वर्ष के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी काकी झामीबाई मनीराम ने किया। बचपन से ही उन्होंने संघर्ष, मेहनत और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके सामाजिक और साहित्यिक जीवन की प्रेरणा बने।

शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

मोहन गणुजी नायक राठोड ने शिक्षा प्राप्त करते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझा। उन्होंने बी.ए. प्रथम वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की।

छात्र जीवन से ही उनमें सामाजिक नेतृत्व की भावना दिखाई देने लगी थी। वर्ष 1972 में फुलसिंग नाईक महाविद्यालय, पुसद (जिला यवतमाल) में वे गैदरिंग के सहसचिव रहे। इसी समय से उन्होंने सांस्कृतिक गतिविधियों और सामाजिक संगठन में सक्रिय भाग लेना शुरू किया।

ग्राम विकास और सामाजिक कार्य

मोहन गणुजी नायक राठोड ने अपने गांव चिंचखेड के विकास और सामाजिक एकता के लिए वर्ष 1972 में ग्राम स्नेह सम्मेलन की स्थापना की। वे लगभग 20 वर्षों तक इस संस्था के अध्यक्ष रहे।

ग्राम स्नेह सम्मेलन के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण युवाओं और समाज को जोड़ने का कार्य किया। इस मंच के माध्यम से प्रतिवर्ष विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों का आयोजन किया जाता था।

इन गतिविधियों में प्रमुख रूप से शामिल थे:

  • कबड्डी प्रतियोगिता
  • वॉलीबॉल प्रतियोगिता
  • कुश्ती प्रतियोगिता
  • रंगोली प्रतियोगिता
  • स्वस्थ बालक प्रतियोगिता (बोनी बेबी कॉम्पिटिशन)
  • परिसंवाद
  • कीर्तन
  • भजन प्रतियोगिता
  • सांस्कृतिक कार्यक्रम

उन्होंने गांव में अनेक नाट्य प्रयोग भी आयोजित किए। कला और संस्कृति के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण समाज में जागृति लाने का प्रयास किया।

रंगमंच और सांस्कृतिक योगदान

मोहन जी स्वयं भी रंगमंच से जुड़े रहे। उन्होंने प्रसिद्ध नाटकों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमुख नाटक:

  • "श्यामची आई"
  • "सोळावं वरीस धोक्याचं"

इन नाट्य प्रयोगों में उन्होंने झाड़ीबोली अभिनेत्री कु. शोभा जोगदेव और रागिणी बेडेकर, नागपुर जैसी कलाकारों के साथ अभिनय किया।

यह विशेष प्रस्तुति 27 और 29 दिसंबर 1987 को आयोजित की गई थी।

उनके लिए साहित्य और कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि समाज जागरण का प्रभावी साधन था।

कृषि और ग्रामीण विकास में योगदान

ग्राम स्नेह सम्मेलन के माध्यम से उन्होंने कृषि और किसानों के हित में भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

प्रतिवर्ष आयोजित कार्यक्रमों में:

  • शंकर पट
  • कृषि प्रदर्शन
  • कृषि मेले
  • दुग्ध प्रतियोगिता

का आयोजन किया जाता था।

उन्होंने ग्रामीण किसानों को आधुनिक कृषि, पशुपालन और सामाजिक सहयोग की दिशा में प्रेरित किया।

बंजारा समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष

मोहन गणुजी नायक राठोड का सबसे महत्वपूर्ण योगदान बंजारा समाज के सामाजिक अधिकारों और पहचान के आंदोलन में रहा है।

उन्होंने बंजारा समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) प्रवर्ग में शामिल करने की मांग के लिए कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई।

बंजारा मेळावा – 1982

दिनांक 21 नवंबर 1982 को दहेली तांडा में अखिल भारतीय बंजारा सेवा संघ, शाखा किनवट की ओर से बंजारा समाज के ST समावेश की मांग को लेकर विशाल बंजारा मेळावा आयोजित किया गया।

इस आयोजन में प्रमुख भूमिका निभाने वालों में शामिल थे:

  • प्रा. इंद्रसिंग राठोड
  • धनलाल नाईक
  • भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक

कार्यक्रम के उद्घाटक:

प्रा. राजाराम राठोड

अध्यक्ष:

शामरावजी नाईक

प्रमुख अतिथि:

सुधाकररावजी नाईक

किसान आंदोलन और जनसंघर्ष

मोहन जी ने किसानों और आम जनता के अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया।

उन्होंने किसानों के न्याय और हक के लिए कई आंदोलनों में भाग लिया:

  • 18 नवंबर 1983 – रास्ता रोको आंदोलन
  • 14 से 16 नवंबर 1983 – किनवट तहसील कार्यालय के सामने आमरण उपोषण
  • 22 नवंबर 1983 – सिंदखेड पुलिस स्टेशन जेल भरो आंदोलन

इस जेल भरो आंदोलन में लगभग 1257 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

उनका उद्देश्य किसानों और गरीब जनता को न्याय दिलाना था।

सामाजिक संस्थाओं में भूमिका

मोहन गणुजी नायक राठोड विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहे।

उनकी प्रमुख भूमिकाएं:

  • गोविंद दुग्ध संस्था चिंचखेड के अध्यक्ष
  • लोक न्यायालय में किनवट पंच के रूप में नियुक्ति
  • सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं में सक्रिय सहभागिता

गोविंद दुग्ध संस्था के माध्यम से उन्होंने वर्ष 1983 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 25 परिवारों को भैंस खरीदने के लिए ऋण वितरण कराया।

इसके साथ ही पशु रोग निदान शिविरों का भी आयोजन किया गया।

गोर बंजारा साहित्य और भाषा संरक्षण का कार्य

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का सबसे बड़ा योगदान गोरमाटी बोलीभाषा के संरक्षण और संवर्धन में रहा है।

उन्होंने गोरमाटी भाषा को केवल बोलचाल की भाषा नहीं माना, बल्कि इसे एक समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

वर्ष 2003 से वे लगातार प्रयासरत हैं कि गोरमाटी बोलीभाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया जाए।

इस उद्देश्य से उन्होंने:

  • भारत के राष्ट्रपति को निवेदन भेजे
  • प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिए
  • साहित्य अकादमी को गोरबोली साहित्य भेजा
  • गोरमाटी भाषा के साहित्यिक महत्व को प्रस्तुत किया

गोर बंजारा साहित्य में योगदान

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड ने गोर बंजारा समाज की संस्कृति, परंपरा, लोकजीवन और भाषा को साहित्य के माध्यम से संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से गोर समाज की ऐतिहासिक पहचान, सामाजिक समस्याओं, सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन शैली को समाज के सामने प्रस्तुत किया।

उनका मानना रहा है कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और साहित्य से होती है। इसी विचार के साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन गोरमाटी बोलीभाषा के संवर्धन और साहित्य निर्माण के लिए समर्पित किया।

उन्होंने मराठी और गोरबोली दोनों भाषाओं में लेखन किया तथा अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथों की रचना की।

भीमणीपुत्र की प्रकाशित ग्रंथ संपदा

मोहन गणुजी नायक राठोड द्वारा रचित और संपादित साहित्य गोर बंजारा समाज की सांस्कृतिक धरोहर है। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियां इस प्रकार हैं:

1. नसाबी (विशेषांक)

यह विशेषांक गोर समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रयास है।

2. गोरमाटी संस्कृती आणि संकेत (मराठी)

इस पुस्तक में गोरमाटी संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक संकेतों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

3. केसुला (मराठी कविता संग्रह)

"केसुला" उनका प्रसिद्ध कविता संग्रह है, जिसमें समाज, संस्कृति और भावनाओं का सुंदर चित्रण देखने को मिलता है।

4. क्रांतिसिंह सेवादास तोडावाळो (मराठी)

यह ग्रंथ समाज के महान व्यक्तित्व और उनके योगदान को प्रस्तुत करता है।

5. तुकारी (मराठी)

यह उनकी महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना है, जिसमें सामाजिक और मानवीय विचारों को अभिव्यक्ति दी गई है।

6. गोरपान – गोरबोलीतील भाषा सौंदर्य (मराठी)

इस पुस्तक में गोरबोली भाषा की सुंदरता, शब्द संपदा और भाषाई विशेषताओं का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

7. मारोणी (गोरबोली)

गोरबोली भाषा में लिखी गई यह महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना है।

8. लावण (गोरबोली)

इस रचना के माध्यम से उन्होंने गोरबोली साहित्य को समृद्ध किया।

9. वाते मुंगा मोलारी भाग – 1 (गोरबोली)

यह गोरबोली भाषा में समाज जागरण और चिंतनपरक लेखों का संग्रह है।

10. वाते मुंगा मोलारी भाग – 2 (गोरबोली)

इस ग्रंथ का संपादन एडवोकेट चेतन नायक द्वारा किया गया है।

11. संमेलनाध्यक्षीय भाषण (गोरबोली)

विभिन्न साहित्य सम्मेलनों में दिए गए उनके अध्यक्षीय भाषणों का यह संग्रह है।

12. गोरमाटी बोलीभाषेचे सामाजिक आविष्कार आणि लोकजीवन (2021)

इस महत्वपूर्ण ग्रंथ का संपादन प्रा. भारती अ. मुडे द्वारा किया गया।

इस पुस्तक में गोरमाटी भाषा के सामाजिक स्वरूप और लोकजीवन का विस्तृत अध्ययन किया गया है।

13. गोरमाटी बोलीभाषा वाङमय व कलांचे स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्र

यह ग्रंथ गोरमाटी साहित्य और कला के स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्र को प्रस्तुत करता है।

अप्रकाशित साहित्य

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड के कई महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य अभी अप्रकाशित हैं।

उनकी प्रमुख अप्रकाशित हस्तलिखित रचनाएं:

1. नकता – Distinctive Culture

यह गोर संस्कृति और परंपराओं का चित्रात्मक अध्ययन है।

2. गोरमाटी बोलीभाषा: स्वतंत्र साहित्यिक भाषा (गोर बोली)

इस रचना में उन्होंने गोरमाटी भाषा के साहित्यिक स्वरूप को प्रस्तुत किया है।

3. चालतू छेडा (लेख संग्रह)

यह समाज प्रबोधनपरक लेखों का संग्रह है।

इसके अलावा उन्होंने वंजारी/बंजारी वाद-विवाद से संबंधित कई चर्चित लेख भी लिखे।

उनके प्रसिद्ध लेख स्तंभ:

  • वाते मुंगा मोलारी
  • काकडवांदा
  • आनवाल
  • थु:पेल
  • चालतू छेडा

इन लेखों के माध्यम से उन्होंने समाज में जागृति, विचार परिवर्तन और सामाजिक सुधार का संदेश दिया।

साहित्य सम्मेलन और नेतृत्व

मोहन गणुजी नायक राठोड ने गोर बंजारा साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए अनेक साहित्य सम्मेलनों में नेतृत्व किया।

उनकी प्रमुख उपलब्धियां:

पहला गोर बंजारा साहित्य सम्मेलन – उमरखेड

वर्ष 2003 में उमरखेड, जिला यवतमाल में आयोजित प्रथम गोर बंजारा साहित्य सम्मेलन के वे सम्मेलन अध्यक्ष रहे।

यह सम्मेलन गोर बंजारा साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।

अखिल भारतीय बंजारा परिषद पुणे – 2011

वर्ष 2011 में पुणे में आयोजित अखिल भारतीय बंजारा परिषद में वे साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रहे।

पांचवां अखिल भारतीय गोर बंजारा साहित्य सम्मेलन

वर्ष 2018 में मुंबई-डोंबिवली में आयोजित पांचवें अखिल भारतीय गोर बंजारा साहित्य सम्मेलन के वे सम्मेलन अध्यक्ष रहे।

नंगारा भवन पोहरागढ़ से जुड़ाव

मोहन गणुजी नायक राठोड नंगारा भवन पोहरागढ़, महाराष्ट्र के समन्वयक के रूप में भी कार्यरत रहे।

पोहरागढ़ गोर बंजारा समाज की आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां से जुड़े सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यों में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है।

गोरमाटी भाषा गौरव दिवस

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का जन्मदिन 2 अप्रैल को हर वर्ष "गोरमाटी भाषा गौरव दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन गोरमाटी भाषा, साहित्य और संस्कृति के सम्मान का प्रतीक बन चुका है।

उनके अथक प्रयासों के कारण समाज में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

पुरस्कार एवं सम्मान

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड के सामाजिक, साहित्यिक और भाषाई योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया है। ये सम्मान उनके वर्षों के संघर्ष, समाज सेवा और गोरमाटी भाषा के प्रति समर्पण का प्रमाण हैं।

उनके प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान इस प्रकार हैं:

1. समाज भूषण पुरस्कार (2002)

वर्ष 2002 में उन्हें बहुजन आघाडी, किनवट की ओर से "समाज भूषण पुरस्कार" प्रदान किया गया।

यह सम्मान उनके सामाजिक कार्यों और समाज जागृति के लिए दिया गया।

2. विज्ञाननिष्ठ पुरस्कार (2004)

वर्ष 2004 में उन्हें "रट्टा" – प्रा. अशोक राणा की ओर से विज्ञाननिष्ठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

यह सम्मान उनके विचारशील लेखन और सामाजिक दृष्टिकोण के लिए प्रदान किया गया।

3. चंद्राबाई राठोड ग्रामीण साहित्य पुरस्कार (2006)

वर्ष 2006 में उन्हें चंद्राबाई राठोड ग्रामीण साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

यह पुरस्कार कै. मक्काजी नाईक वाङ्मय पुरस्कार समिति, कमळेवाडी द्वारा प्रदान किया गया।

यह सम्मान उनके ग्रामीण साहित्य और समाज जीवन के चित्रण के लिए दिया गया।

4. बंजारा भूषण पुरस्कार (2006)

वर्ष 2006 में उन्हें ऑल इंडिया बंजारा सेवा संघ, महाराष्ट्र की ओर से "बंजारा भूषण पुरस्कार" प्रदान किया गया।

यह सम्मान गोर बंजारा समाज, संस्कृति और भाषा के संरक्षण में उनके योगदान के लिए दिया गया।

5. जीवन गौरव पुरस्कार (2024)

वर्ष 2024 में उन्हें "जीवन गौरव पुरस्कार" से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान "स्वच्छंद भरारी" और "गोरबोली रेडू" खानदेश संस्था के संस्थापक एकनाथ गोफणे द्वारा प्रदान किया गया।

यह पुरस्कार उनके जीवनभर के साहित्यिक और सामाजिक योगदान का सम्मान है।

6. साहित्य सेवा पुरस्कार (2026)

वर्ष 2026 में उन्हें "साहित्य सेवा पुरस्कार" प्रदान किया गया।

यह पुरस्कार महाराष्ट्र पर्यटन विभाग और नंगारा भवन पोहरागढ़ के संयुक्त तत्वावधान में दिया गया।

यह सम्मान गोरमाटी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनके लंबे समय के कार्यों की सराहना है।

राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय में साहित्य का समावेश

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड की साहित्यिक प्रतिभा को शैक्षणिक स्तर पर भी मान्यता मिली है।

उनकी प्रसिद्ध कहानी:

"रुपी माझी साक्ष"

को राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर के बी.कॉम प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम (2020-2021) में शामिल किया गया।

यह उपलब्धि उनके लेखन की साहित्यिक गुणवत्ता और प्रभाव को दर्शाती है।

परिवार परिचय

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का पारिवारिक जीवन भी संघर्ष, संस्कार और सामाजिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है।

उनका जन्म:

पिता – गणुजी नायक
माता – भीमणीबाई (माहेर – सिंगोडा परिवार)

के घर हुआ।

उनके माता-पिता मेहनती किसान थे। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करते हुए अपने परिवार और बच्चों का पालन-पोषण किया।

पत्नी और संतान

पत्नी:

श्रीमती शेवंती मोहन नाईक

उनका मायका पालाईगुडा, तालुका माहूर है।

संतान:

1. बेबी प्रदीप नाईक

वे उनकी एकमात्र बहन हैं।

उनका विवाह:

मा. प्रदीप नाईक (पूर्व विधायक)

के साथ हुआ है।

2. आराधना तुळशीराम चव्हाण

स्थान:

ढाणकी, तालुका उमरखेड

उनके पति शिक्षक हैं।

3. प्रा. भारती अनिल मुडे

वे कोल्हापुर में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।

उन्होंने साहित्य और शिक्षा क्षेत्र में अपना योगदान दिया है।

4. एडवोकेट चेतनकुमार नाईक

वे पेशे से वकील हैं।

वे दिवाणी न्यायालय, माहूर में कानून क्षेत्र से जुड़े हैं।

उन्होंने "वाते मुंगा मोलारी भाग-2" के संपादन में भी योगदान दिया है।

5. धीरज नाईक

वे कृषि व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

जीवन दर्शन और सामाजिक संदेश

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का जीवन संघर्ष, सेवा और समर्पण की प्रेरणादायक कहानी है।

एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेने के बाद उन्होंने अपनी मेहनत, विचार और लेखनी के बल पर समाज में विशेष स्थान बनाया।

उन्होंने हमेशा यह संदेश दिया कि:

  • समाज की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है।
  • अपनी मातृभाषा का संरक्षण प्रत्येक पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
  • शिक्षा और साहित्य समाज परिवर्तन के सबसे प्रभावी साधन हैं।
  • सामाजिक अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष आवश्यक है।

निष्कर्ष

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि गोरमाटी भाषा, गोर बंजारा संस्कृति और सामाजिक चेतना के एक आंदोलन का नाम हैं।

उन्होंने अपना जीवन गोर समाज की पहचान, भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए समर्पित किया। सामाजिक आंदोलनों से लेकर साहित्य सृजन तक, ग्रामीण विकास से लेकर भाषा संरक्षण तक उनका योगदान अमूल्य है।

उनकी लेखनी ने गोर समाज के लोकजीवन को शब्द दिए और उनके संघर्षों ने आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया।

गोरमाटी भाषा और गोर बंजारा समाज के इतिहास में भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का नाम सदैव सम्मान और गौरव के साथ याद किया जाएगा।

— भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड
जन्म: 2 अप्रैल 1950
चिंचखेड, ता. किनवट, जि. नांदेड, महाराष्ट्र

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड गोर बंजारा समाज के प्रसिद्ध साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और गोरमाटी भाषा के प्रचारक हैं। उन्होंने अपना जीवन गोर बंजारा संस्कृति, भाषा और समाज के अधिकारों के लिए समर्पित किया है।

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का जन्म 2 अप्रैल 1950 को महाराष्ट्र के नांदेड जिले के किनवट तालुका स्थित चिंचखेड गांव में हुआ।

उन्होंने वर्ष 2003 से गोरमाटी बोलीभाषा को स्वतंत्र साहित्यिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने और भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए प्रयास किए। उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और साहित्य अकादमी को गोरबोली साहित्य भेजकर निवेदन भी किए।

उनकी प्रमुख रचनाओं में गोरमाटी संस्कृती आणि संकेत, केसुला, क्रांतिसिंह सेवादास तोडावाळो, तुकारी, गोरपान गोरबोलीतील भाषा सौंदर्य, मारोणी, लावण, वाते मुंगा मोलारी भाग-1 और भाग-2 जैसी महत्वपूर्ण कृतियां शामिल हैं।

उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें समाज भूषण पुरस्कार (2002), विज्ञाननिष्ठ पुरस्कार (2004), चंद्राबाई राठोड ग्रामीण साहित्य पुरस्कार (2006), बंजारा भूषण पुरस्कार (2006), जीवन गौरव पुरस्कार (2024) और साहित्य सेवा पुरस्कार (2026) प्रमुख हैं।

2 अप्रैल भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड का जन्मदिन है। गोरमाटी भाषा और साहित्य के प्रति उनके योगदान को सम्मान देने के लिए इस दिन को "गोरमाटी भाषा गौरव दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

भीमणीपुत्र मोहन गणुजी नायक राठोड गोर बंजारा समाज में भाषा, साहित्य और सामाजिक जागृति के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने लेखन, आंदोलन और सामाजिक कार्यों के माध्यम से समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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