राठोड मोतीराम रूपसिंग : संघर्ष, शिक्षा और साहित्य साधना का प्रेरणादायी जीवन परिचय

राठोड मोतीराम रूपसिंग महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शिक्षक, साहित्यकार और समाजसेवी हैं। अत्यंत गरीब परिवार से निकलकर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। 4 जनवरी 1959 को हिरानगर तांडा, जिला नांदेड में जन्मे राठोड जी ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 1984 में शिक्षक के रूप में सेवा शुरू की। वे गटशिक्षण अधिकारी वर्ग-2 के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को अंग्रेजी विषय का निःशुल्क मार्गदर्शन दिया। वर्ष 2022 से साहित्य लेखन शुरू करते हुए उन्होंने गोरमाटी लोकजीवन, बंजारा संस्कृति और ग्रामीण समाज पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें अनेक राज्यस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

Jul 18, 2026 - 12:55
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राठोड मोतीराम रूपसिंग : संघर्ष, शिक्षा और साहित्य साधना का प्रेरणादायी जीवन परिचय

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

राठोड मोतीराम रूपसिंग जी का जन्म 4 जनवरी 1959 को महाराष्ट्र के हिरानगर तांडा, तहसील मुखेड, जिला नांदेड में एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ। उनका बचपन अभावों और कठिन परिस्थितियों में बीता। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार घर में तीन-तीन दिन तक चूल्हा नहीं जलता था। ऐसे कठिन समय में भी उन्होंने शिक्षा का मार्ग नहीं छोड़ा और संघर्ष करते हुए अपने जीवन को नई दिशा दी।

उनका परिवार शिक्षा से वंचित था। घर में सभी लोग निरक्षर थे। सात भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे। उनके परिवार में चार बहनें और तीन भाई थे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर शिक्षा प्राप्त की और अपने तांडे के पहले नौकरी प्राप्त करने वाले व्यक्ति बने।

शिक्षा यात्रा

राठोड मोतीराम जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आश्रम विद्यालय में पहली से दसवीं कक्षा तक पूरी की। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए शिवाजी महाविद्यालय, उदगीर में प्रवेश लिया।

उन्होंने कला शाखा से शिक्षा प्राप्त की और समाजशास्त्र विषय में विशेष सफलता हासिल की। बारहवीं कला (Arts) में वे मराठवाड़ा क्षेत्र में प्रथम स्थान पर रहे। वे पिछड़ा वर्ग (मागास वर्ग) से आने वाले विद्यार्थियों में बोर्ड परीक्षा में मराठवाड़ा स्तर पर प्रथम रहे।

उन्होंने आगे चलकर:

  • बी.ए. (अंग्रेजी)
  • बी.एड. (शिक्षण प्रशिक्षण)

की उपाधि प्राप्त की।

बी.एड. की शिक्षा उन्होंने शासकीय महाविद्यालय, नांदेड से पूरी की।

शिक्षक के रूप में सेवा यात्रा

राठोड मोतीराम रूपसिंग जी ने वर्ष 1984 में शिक्षक के रूप में अपने सेवाकार्य की शुरुआत की। उनका पहला कार्यस्थल मनोविकास विद्यालय, कंधार था।

उनकी सेवा यात्रा इस प्रकार रही:

  • 1984 – माध्यमिक शिक्षक, मनोविकास विद्यालय, कंधार
  • 1986 – जिला परिषद हाईस्कूल, हदगांव, जिला नांदेड
  • 1994 – जिला परिषद हाईस्कूल, विष्णुपुरी, नांदेड
  • 2002-03 से – शिक्षा विस्तार अधिकारी के रूप में कार्य
  • 2008 से – गटशिक्षण अधिकारी (प्रशासनिक) लोहा, जिला नांदेड
  • गटशिक्षण अधिकारी वर्ग-2 के पद से वर्ष 2016 में कंधार से सेवानिवृत्त

एक शिक्षक के रूप में उन्होंने केवल नौकरी नहीं की, बल्कि शिक्षा को समाज सेवा का माध्यम बनाया।

विद्यार्थियों के लिए समर्पण

वर्ष 1984 से 2026 तक उन्होंने जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी का भेदभाव किए बिना विद्यार्थियों को अंग्रेजी विषय का निःशुल्क मार्गदर्शन दिया।

उन्होंने ग्रामीण और गरीब विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा प्रयास किया। उनके मार्गदर्शन से अनेक विद्यार्थियों ने शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त की।

उन्होंने शिक्षकों के लिए आयोजित सैकड़ों प्रशिक्षण शिविरों में अंग्रेजी विषय को प्रभावी तरीके से कैसे पढ़ाया जाए, इस विषय पर मार्गदर्शन दिया।

साहित्यिक यात्रा

सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2022 से उन्होंने लेखन कार्य प्रारंभ किया। अपने अनुभव, समाज, संस्कृति और ग्रामीण जीवन को उन्होंने साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत किया।

उनकी प्रकाशित प्रमुख साहित्यिक कृतियां:

  1. आठवणींचं गाठोडं – आत्मकथन
  2. गोरमाटी लोकजीवन : काल आणि आज
  3. वचपा – कादंबरी
  4. झूनकी – बंजारा बोलीभाषा कथा संग्रह
  5. नवी शर्यंत – बालकथा संग्रह

प्रकाशन की प्रतीक्षा में साहित्य

  1. काचेकोडी – बंजारा बोलीभाषा कथा संग्रह
  2. सेवाभायाची शिकवण – कथा संग्रह
  3. वसंतराव नाईक – चरित्रात्मक पुस्तक
  4. कथा कानासुनिच्या
  5. एक गाव बारा भानगडी – ग्रामीण कथा संग्रह

उन्होंने विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विषयों पर अनेक दैनिक समाचार पत्रों में लेखन किया है।

साहित्य और समाज सेवा में योगदान

राठोड मोतीराम जी ने गोर बंजारा समाज की संस्कृति, लोकजीवन, भाषा और परंपराओं को साहित्य के माध्यम से संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

उन्होंने:

  • अखिल भारतीय बंजारा साहित्य सम्मेलन, हैदराबाद में सहभागिता की।
  • गोर बंजारा साहित्य सम्मेलन, पोहरागढ़ (ता. मानोरा, जिला वाशिम) के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
  • महाराष्ट्र राज्य गोर बंजारा साहित्य परिषद, मुंबई के पूर्व अशासकीय सदस्य के रूप में योगदान दिया।

प्राप्त राज्यस्तरीय पुरस्कार और सम्मान

उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है:

  1. प्रसाद बन गौरव ग्रंथ राज्यस्तरीय पुरस्कार, नांदेड
  2. पद्मगंधा प्रतिष्ठान नागपूर राज्यस्तरीय उत्कृष्ट वाङ्मय पुरस्कार, नागपूर
  3. संत नामदेव राष्ट्रीय कादंबरी पुरस्कार, हिंगोली
  4. मातोश्री कै. सौ. केवळ बाई ग्रंथ गौरव राज्यस्तरीय पुरस्कार, नायगाव
  5. राज्यस्तरीय श्रीस्थानक साहित्य पुरस्कार, ठाणे
  6. राज्यस्तरीय उज्वल साहित्य रत्न पुरस्कार, कंधार
  7. मातोश्री भागाबाई राज्यस्तरीय साहित्य पुरस्कार, उमरी
  8. रोहिणी वाकडे साहित्य दर्शन प्रतिष्ठान राज्यस्तरीय साहित्य पुरस्कार, कळमनुरी
  9. अक्षरोदय राज्यस्तरीय साहित्य गौरव पुरस्कार, नांदेड
  10. राज्यस्तरीय शब्दांगण पुरस्कार, चंद्रपूर
  11. मराठी भाषा संवर्धन राज्यस्तरीय पुरस्कार, आर्णी (जिला यवतमाळ)
  12. अक्षराचे झाड राज्यस्तरीय साहित्य पुरस्कार, सेलू (परभणी)

निवास

वर्तमान में उनका निवास:

"गोमती सावली", काळेश्वर नगर, विष्णुपुरी, नांदेड – 6, महाराष्ट्र

निष्कर्ष

राठोड मोतीराम रूपसिंग जी का जीवन संघर्ष, शिक्षा, सेवा और साहित्य साधना का प्रेरणादायी उदाहरण है। अत्यंत गरीबी और कठिन परिस्थितियों से निकलकर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में पहचान बनाई और हजारों विद्यार्थियों के जीवन को दिशा दी।

एक शिक्षक, समाजसेवी और साहित्यकार के रूप में उन्होंने गोर बंजारा समाज सहित पूरे मराठी साहित्य जगत में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका जीवन संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, मेहनत, शिक्षा और दृढ़ संकल्प के बल पर सफलता प्राप्त की जा सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों

राठोड मोतीराम रूपसिंग जी का जन्म 4 जनवरी 1959 को महाराष्ट्र के हिरानगर तांडा, तहसील मुखेड, जिला नांदेड में हुआ था। उनका बचपन अत्यंत गरीबी और संघर्षों में बीता।

उन्होंने आश्रम विद्यालय से पहली से दसवीं तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद शिवाजी महाविद्यालय उदगीर से बी.ए. (अंग्रेजी) और शासकीय महाविद्यालय नांदेड से बी.एड. की शिक्षा पूरी की।

उन्होंने वर्ष 1984 में मनोविकास विद्यालय, कंधार से माध्यमिक शिक्षक के रूप में अपने सेवाकार्य की शुरुआत की। बाद में वे शिक्षा विस्तार अधिकारी और गटशिक्षण अधिकारी वर्ग-2 के पद तक पहुंचे।

उन्होंने 1984 से विद्यार्थियों को जाति-पाति और आर्थिक भेदभाव से ऊपर उठकर अंग्रेजी विषय का निःशुल्क मार्गदर्शन दिया। उन्होंने शिक्षकों के अनेक प्रशिक्षण वर्गों में अंग्रेजी शिक्षण पद्धति पर मार्गदर्शन भी किया।

उनकी प्रमुख प्रकाशित रचनाओं में "आठवणींचं गाठोडं" (आत्मकथन), "गोरमाटी लोकजीवन : काल आणि आज", "वचपा" (कादंबरी), "झूनकी" (बंजारा बोली कथा संग्रह) और "नवी शर्यंत" (बालकथा संग्रह) शामिल हैं।

उन्हें प्रसाद बन गौरव ग्रंथ पुरस्कार, पद्मगंधा प्रतिष्ठान नागपूर राज्यस्तरीय उत्कृष्ट वाङ्मय पुरस्कार, संत नामदेव राष्ट्रीय कादंबरी पुरस्कार, उज्वल साहित्य रत्न पुरस्कार सहित कई राज्यस्तरीय साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

उन्होंने गोर बंजारा समाज की भाषा, संस्कृति और लोकजीवन को साहित्य के माध्यम से संरक्षित करने का कार्य किया। वे गोर बंजारा साहित्य सम्मेलन पोहरागढ़ के अध्यक्ष रहे और महाराष्ट्र राज्य गोर बंजारा साहित्य परिषद मुंबई के पूर्व अशासकीय सदस्य भी रहे हैं।

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